BharatKosha
महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva

by महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास

DevanagariSanskritpublished2,450 pages

Page 2126 of 2450

Read in context
Page 2126

तदयुक्तस्य ते मोक्षे योऽभिमानो भवेन्नृप । सुहृद्भिः संनिवार्यस्तेऽविरक्तस्येव भेषजम् ।। १३३ ।। नरेश्वर! वास्तवमें आप योगयुक्त नहीं हैं तथापि आपको जो जीवन्मुक्तिका अभिमान हो रहा है, वह आपके सुहृदोंको दूर कर देना चाहिये अर्थात् यह नहीं मानना चाहिये कि आप जीवन्मुक्त हैं, ठीक उसी तरह जैसे अपथ्यशील रोगीको दवा देना बंद कर दिया जाता है ।। १३३ ।।

तानि तानि तु संचिन्त्य सङ्गस्थानान्यरंदिम । आत्मनाऽऽत्मनि सम्पश्येत् किमन्यन्मुक्तलक्षणम् ।। १३४ ।। शत्रुओंका दमन करनेवाले महाराज! नाना प्रकारके जो-जो पदार्थ हैं, उन सबको आसक्तिके स्थान समझकर अपने द्वारा अपनेहीमें अपनेको देखे। इसके सिवा मुक्तका और क्या लक्षण हो सकता है? ।। १३४ ।।

इमान्यन्यानि सूक्ष्माणि मोक्षमाश्रित्य कानिचित् । चतुरङ्गप्रवृत्तानि सङ्गस्थानानि मे शृणु ।। १३५ ।। राजन्! अपने मोक्षका आश्रय लेकर भी ये और दूसरे जो कुछ चार अंगोंमें प्रवृत्त आसक्तिके जो सूक्ष्म स्थान हैं, उनको भी अपना रखा है, उन्हें बताती हूँ, आप मुझसे सुनें ।। १३५ ।।

य इमां पृथिवीं कृत्स्नामेकच्छत्रां प्रशास्ति ह । एक एव स वै राजा पुरमध्यावसत्युत ।। १३६ ।। जो इस सारी पृथिवीका एकच्छत्र शासन करता है, वह एक ही सार्वभौम नरेश भी एकमात्र नगरमें ही निवास करता है ।। १३६ ।।

तत्पुरे चैकमेवास्य गृहं यदधितिष्ठति । गृहे शयनमप्येकं निशायां यत्र लीयते ।। १३७ ।। उस नगरमें भी उसके लिये एक ही महल होता है, जिसमें वह निवास करता है। उस महलमें भी उसके लिये एक ही शय्या होती है, जिसपर वह रातमें सोता है ।। १३७ ।।

शय्यार्धं तस्य चाप्यत्र स्त्रीपूर्वमधितिष्ठति । तदनेन प्रसङ्गेन फलेनैवेह युज्यते ।। १३८ ।। उस शय्याके भी आधे भागपर राजाकी स्त्रीका अधिकार होता है; अतः इस प्रसंगसे वह बहुत अल्प फलका ही भागी होता है ।। १३८ ।।

एवमेवोपभोगेषु भोजनाच्छादनेषु च । गुणेषु परिमेयेषु निग्रहानुग्रहं प्रति ।। १३९ ।। परतन्त्रः सदा राजा स्वल्पेष्वपि प्रसज्जते । संधिविग्रहयोगे च कुतो राज्ञः स्वतन्त्रता ।। १४० ।।