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महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva

by महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास

DevanagariSanskritpublished2,450 pages

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अव्यक्तप्रकृतिरयं कलाशरीरः

सूक्ष्मात्मा क्षणत्रुटिशो निमेषरोमा ।

ऋत्वास्यः समबलशुक्लकृष्णनेत्रो

मासाङ्गो द्रवति वयोहयो नराणाम् ।। २५ ।।

तं दृष्ट्वा प्रसृतमजस्रमुग्रवेगं

गच्छन्तं सततमिहाव्यपेक्षमाणम् ।

चक्षुस्ते यदि न परप्रणेतृनेयं

धर्मे ते भवतु मनः परं निशाम्य ।। २६ ।।

मनुष्योंका आयुरूप अश्व बड़े वेगसे दौड़ा जा रहा है। इसका स्वभाव

अव्यक्त है। कला-काष्ठा आदि इसके शरीर हैं। इसका स्वरूप अत्यन्त सूक्ष्म है।

क्षण, त्रुटि (चुटकी) और निमेष आदि इसके रोम हैं। ऋतुएँ मुख हैं। समान

बलवाले शुक्ल और कृष्णपक्ष नेत्र हैं तथा महीने इसके विभिन्न अंग हैं। वह

भयंकर वेगशाली अश्व यहाँकी किसी वस्तुकी अपेक्षा न रखकर निरन्तर

अविराम गतिसे वेगपूर्वक भागा जा रहा है। उसे देखकर यदि तुम्हारी ज्ञानदृष्टि

दूसरेके द्वारा चलानेपर चलनेवाली नहीं है; तो तुम्हारा मन धर्ममें ही लगना

चाहिये। तुम दूसरे धर्मात्माओंपर भी दृष्टि डालो ।। २५-२६ ।।

ये चात्र प्रचलितधर्मकामवृत्ताः

क्रोशन्तः सततमनिष्टसम्प्रयोगाः ।

क्लिश्यन्तः परिगतवेदनाशरीरा

बह्वीभिः सुभृशमधर्मकारणाभिः ।। २७ ।।

जो लोग यहाँ धर्मसे विचलित हो स्वेच्छाचारमें लगे हुए हैं, दूसरोंको बुरा-

भला कहते हुए सदा अनिष्टकारी अशुभ कर्मोंमें ही लगे हुए हैं, वे मरनेके बाद

यातनादेह पाकर अपने अनेक पापकर्मोंके कारण अत्यन्त क्लेश भोगते

हैं ।। २७ ।।

राजा सदा धर्मपरः शुभाशुभस्य गोप्ता

समीक्ष्य सुकृतिनां दधाति लोकान् ।

बहुविधमपि चरति प्रविशति

सुखमनुपगतं निरवद्यम् ।। २८ ।।

जो राजा सर्वदा धर्मपरायण रहकर उत्तम और अधम प्रजाका यथायोग्य

विचारपूर्वक पालन करता है, वह पुण्यात्माओंके लोकोंको प्राप्त होता है। यदि

वह स्वयं भी नाना प्रकारके शुभ कर्मोंका आचरण करता है तो उसके

फलस्वरूप उसे अप्राप्त एवं निर्दोष सुख प्राप्त होता है ।। २८ ।।

श्वानो भीषणकाया अयोमुखानि वयांसि