महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व
Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva
by महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास
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Read in contextजिस धनको न तो राजासे भय है और न चोरसे ही तथा जो मर जानेपर भी जीवका साथ नहीं छोड़ता है, उस धर्मरूपी धनका उपार्जन करो ॥ ४६ ॥
न तत्र संवियुज्यते स्वकर्मभिः परस्परम् । यदेव यस्य यौतकं तदेव तत्र सोऽश्नुते ॥ ४७ ॥ अपने कर्मोंके अनुसार प्राप्त हुए उस धनको परलोकमें परस्पर बाँटना नहीं पड़ता है। वहाँ तो जो जिसकी निजी सम्पत्ति है, उसे ही वह भोगता है ॥ ४७ ॥
परत्र येन जीव्यते तदेव पुत्र दीयताम् । धनं यदक्षरं ध्रुवं समर्जयस्व तत् स्वयम् ॥ ४८ ॥ बेटा! जिससे परलोकमें भी जीवन-निर्वाह हो सकता है तथा जो अविनाशी और अटल धन है, उसीका दान करो एवं उसीका स्वयं भी उपार्जन करते रहो ॥ ४८ ॥
न यावदेव पच्यते महाजनस्य यावकम् । अपक्व एव यावके पुरा प्रलीयसे त्वर ॥ ४९ ॥ बेटा! घरपर आये हुए किसी समादरणीय अतिथिके लिये जितनी देरमें यावक (घृत और खाँड़ मिलाकर तैयार किया हुआ जौके आटेका पूआ) पकाया जाता है, उसके पकनेसे भी पहले तुम्हारी मृत्यु हो सकती है; अतः तुम ज्ञानरूपी धनके उपार्जनके लिये शीघ्रता करो ॥ ४९ ॥
न मातृपुत्रबान्धवा न संस्तुतः प्रियो जनः । अनुव्रजन्ति संकटे व्रजन्तमेकपातिनम् ॥ ५० ॥ जीव जब अकेला ही परलोकके पथपर प्रस्थान करता है, उस संकटके समय माता, पुत्र, भाई-बन्धु तथा अन्यान्य प्रशंसित प्रियजन भी उसके साथ नहीं जाते हैं ॥ ५० ॥
यदेव कर्म केवलं पुरा कृतं शुभाशुभम् । तदेव पुत्र सार्थिकं भवत्यमुत्र गच्छतः ॥ ५१ ॥ पुत्र! परलोकमें जाते समय अपना पहलेका किया हुआ जो शुभाशुभ कर्म होता है, केवल वही साथ रहता है ॥ ५१ ॥
हिरण्यरत्नसंचयाः शुभाशुभेन संचिताः । न तस्य देहसंक्षये भवन्ति कार्यसाधकाः ॥ ५२ ॥ मनुष्यके द्वारा अच्छे-बुरे सभी तरहके कर्म करके जो सुवर्ण और रत्नोंके ढेर इकट्ठे किये जाते हैं, वे भी उस मनुष्यके शरीरका नाश होनेपर उसके किसी काम नहीं आते हैं (क्योंकि वे सब यहीं रह जाते हैं) ॥ ५२ ॥
परत्रगामिकस्य ते कृताकृतस्य कर्मणः । न साक्षि आत्मना समो नृणामिहास्ति कश्चन ॥ ५३ ॥