महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व
Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva
by महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास
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Read in contextतदाप्नुवन्ति मानवास्तथा विशुद्धयोनयः ॥ ६० ॥ निष्पाप पुण्यात्मा पुरुषोंद्वारा इस लोकमें जो शुभ कर्म सम्पादित होता है, जन्मान्तरमें विशुद्ध योनिमें जन्म लेकर उसका वैसा ही फल पाते हैं ॥ ६० ॥
प्रजापतेः सलोकतां बृहस्पतेः शतक्रतोः । व्रजन्ति ते परां गतिं गृहस्थधर्मसेतुभिः ॥ ६१ ॥ गृहस्थ-धर्मकी मर्यादाका पालन करनेवाले लोग प्रजापति, बृहस्पति अथवा इन्द्रके लोकमें उत्तम गतिको प्राप्त होते हैं ॥ ६१ ॥
सहस्रशोऽप्यनेकशः प्रवक्तुमुत्सहाम ते । अबुद्धिमोहनं पुनः प्रभुर्निनाय पावकः ॥ ६२ ॥ वत्स! मैं तुम्हारे सामने हजारों तथा उससे भी अधिक बार यह बात जोर देकर कह सकता हूँ कि सर्वशक्तिमान् तथा सबको पवित्र करनेवाले धर्मने, जिसकी बुद्धिपर मोह नहीं छा गया है, उस धर्मात्मा पुरुषको सदा ही पुण्यलोकमें पहुँचाया है ॥ ६२ ॥
गता त्रिषड्वर्षता ध्रुवोऽसि पञ्चविंशकः । कुरुष्व धर्मसंचयं वयो हि तेऽतिवर्तते ॥ ६३ ॥ बेटा! तुम्हारी आयुके चौबीस वर्ष बीत गये। अब निश्चय ही तुम पचीस सालके हो गये; अतः धर्मका संचय करो। तुम्हारी सारी आयु यों ही बीती जा रही है ॥ ६३ ॥
पुरा करोति सोऽन्तकः प्रमादगोमुखां चमूम् । यथागृहीतमुत्थितस्त्वरस्व धर्मपालने ॥ ६४ ॥ देखो, तुम्हारा जो प्रमाद है, उसमें निवास करनेवाला काल तुम्हारी इन्द्रियोंके समुदायको मुखरहित (भोगशक्तिसे हीन) कर रहा है। इनके असमर्थ हो जानेके पहले ही तुम खड़े हो जाओ और अपने शरीरसे धर्मका पालन करनेके लिये जल्दी करो ॥ ६४ ॥
यथा त्वमेव पृष्ठतस्त्वमग्रतो गमिष्यसि । तथा गतिं गमिष्यतः किमात्मना परेण वा ॥ ६५ ॥ जिस समय तुम शरीर छोड़कर परलोककी राह लोगे, उस समय तुम्हीं पीछे रहोगे और तुम्हीं आगे चलोगे—तुम्हारे सिवा दूसरा कोई वहाँ आगे-पीछे चलनेवाला न होगा। ऐसी दशामें किसी अपने या पराये व्यक्तिसे तुम्हारा क्या प्रयोजन है? ॥ ६५ ॥
यदेकपातिनां सतां भवत्यमुत्र गच्छताम् । भयेषु साम्परायिकं निधत्स्व केवलं निधिम् ॥ ६६ ॥