महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व
Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva
by महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास
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Read in contextऋषियोंने यह नियम बनाया है कि हमलोगोंमेंसे जो वेदोंका प्रवचन कर सकेगा, वही महान् माना जायगा ।। ६ ।। तपोमूलमिदं सर्वं यन्मां पृच्छसि पाण्डव । तदिन्द्रियाणि संयम्य तपो भवति नान्यथा ।। ७ ।। पाण्डुनन्दन! तुम मुझसे जिसके विषयमें पूछ रहे हो, उस सबकी जड़ तपस्या है। इन्द्रियोंका संयम करनेसे ही तपस्याकी सिद्धि होती है, अन्यथा नहीं ।। ७ ।। इन्द्रियाणां प्रसङ्गेन दोषमृच्छत्यसंशयम् । संनियम्य तु तान्येव सिद्धिमाप्नोति मानवः ।। ८ ।। इसमें संदेह नहीं कि मनुष्य इन्द्रियोंकी विषयासक्तिके कारण ही दोषको प्राप्त होता है और उन्हीं इन्द्रियोंको काबूमें कर लेनेपर वह सिद्धिका भागी होता है ।। ८ ।। अश्वमेधसहस्रस्य वाजपेयशतस्य च । योगस्य कलया तात न तुल्यं विद्यते फलम् ।। ९ ।। तात! सहस्रों अश्वमेध और सैकड़ों वाजपेय यज्ञोंका जो फल है, वह योगकी सोलहवीं कलाके फलकी भी समानता नहीं कर सकता ।। ९ ।। अत्र ते वर्तयिष्यामि जन्मयोगफलं तथा । शुकस्याग्र्यां गतिं चैव दुर्विदामकृतात्मभिः ।। १० ।। राजन्! मैं तुम्हें शुकदेवजीका जन्म-वृत्तान्त, योगफल तथा अजितात्मा पुरुषोंकी समझमें न आनेवाली उनकी उत्कृष्ट गति बता रहा हूँ ।। १० ।। मेरुशृङ्गे किल पुरा कर्णिकारवनायुते । विजहार महादेवो भीमैर्भूतगणैर्वृतः ।। ११ ।। कहते हैं, पूर्वकालमें कनेरके वनोंसे सुशोभित मेरुपर्वतके शिखरपर भगवान् शंकर भयानक भूतगणोंको साथ ले विहार करते थे ।। ११ ।। शैलराजसुता चैव देवी तत्राभवत् पुरा । तत्र दिव्यं तपस्तेपे कृष्णद्वैपायनस्तदा ।। १२ ।। वहीं गिरिराजकुमारी उमादेवी भी उनके साथ ही निवास करती थीं। उन्हीं दिनों श्रीकृष्णद्वैपायन व्यास उस पर्वतपर दिव्य तपस्या कर रहे थे ।। १२ ।। योगेनात्मानमाविश्य योगधर्मपरायणः । धारयन् स तपस्तेपे पुत्रार्थं कुरुसत्तम ।। १३ ।। कुरुश्रेष्ठ! योगधर्मपरायण व्यास योगके द्वारा अपने मनको परमात्मामें लगाकर धारणापूर्वक तपका अनुष्ठान करते थे। उनके तपका उद्देश्य था पुत्रकी प्राप्ति ।। १३ ।। अग्नेर्भूमेरपां वायोरन्तरिक्षस्य वा विभो । धैर्येण सम्मितः पुत्रो मम भूयादिति स्म ह ।। १४ ।।