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महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva

by महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास

DevanagariSanskritpublished2,450 pages

Page 2207 of 2450

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Page 2207

एतैः सर्वैः समायुक्तः पुमानित्यभिधीयते । त्रिवर्गं तु सुखं दुःखं जीवितं मरणं तथा ॥ ४७ ॥ य इदं वेद तत्त्वेन स वेद प्रभवाप्ययौ । इन सब तत्त्वोंसे जो संयुक्त है, उसे पुरुष कहते हैं। जो पुरुष धर्म, अर्थ, काम, सुख-दुःख और जीवन-मरणके तत्त्वको ठीक-ठीक समझता है, वही उत्पत्ति और प्रलयके तत्त्वको भी यथार्थरूपसे जानता है ॥ पारम्पर्येण बोद्धव्यं ज्ञानानां यच्च किञ्चन ॥ ४८ ॥ इन्द्रियैर्गृह्यते यद् यत् तत् तद् व्यक्तमिति स्थितिः । अव्यक्तमिति विज्ञेयं लिङ्गग्राह्यमतीन्द्रियम् ॥ ४९ ॥ ज्ञानके सम्बन्धमें जितनी बातें हैं, उन्हें परम्परासे जानना चाहिये। जो पदार्थ इन्द्रियोंद्वारा ग्रहण किये जाते हैं, उन्हें व्यक्त कहते हैं और जो इन्द्रियोंके अगोचर होनेके कारण अनुमानसे जाने जाते हैं, उनको अव्यक्त कहते हैं ॥ ४८-४९ ॥ इन्द्रियैर्नियतैर्देही धाराभिरिव तर्प्यते । लोके विततमात्मानं लोकांश्चात्मनि पश्यति ॥ ५० ॥ जिनकी इन्द्रियाँ अपने वशमें हैं, वे जीव उसी प्रकार तृप्त हो जाते हैं, जैसे वर्षाकी धारासे प्यासा मनुष्य। ज्ञानी पुरुष अपनेको प्राणियोंमें व्याप्त और प्राणियोंको अपनेमें स्थित देखते हैं ॥ ५० ॥ परावरदृशः शक्तिर्ज्ञानमूला न नश्यति । पश्यतः सर्वभूतानि सर्वावस्थासु सर्वदा ॥ ५१ ॥ सर्वभूतस्य संयोगो नाशुभेनोपपद्यते । उस परावरदर्शी ज्ञानी पुरुषकी ज्ञानमूलक शक्ति कभी नष्ट नहीं होती। जो सम्पूर्ण भूतोंको सभी अवस्थाओंमें सदा देखा करता है, वह सम्पूर्ण प्राणियोंके सहवासमें आकर भी कभी अशुभ कर्मोंसे युक्त नहीं होता अर्थात् अशुभ कर्म नहीं करता ॥ ५१ १/२ ॥ ज्ञानेन विविधान् क्लेशानतिवृत्तस्य मोहजान् ॥ ५२ ॥ लोके बुद्धिप्रकाशेन लोकमार्गो न रिष्यते । जो ज्ञानके बलसे मोहजनित नाना प्रकारके क्लेशोंसे पार हो गया है, उसके लिये जगत्में बौद्धिक प्रकाशसे कोई भी लोक-व्यवहारका मार्ग अवरुद्ध नहीं होता ॥ अनादिनिधनं जन्तुमात्मनि स्थितमव्ययम् ॥ ५३ ॥ अकर्तारममूर्तं च भगवानाह तीर्थवित् । मोक्षके उपायको जाननेवाले भगवान् नारायण कहते हैं कि आदि-अन्तसे रहित, अविनाशी, अकर्ता और निराकार जीवात्मा इस शरीरमें स्थित है ॥ ५३ १/२ ॥ यो जन्तुः स्वकृतैस्तैस्तैः कर्मभिर्नित्यदुःखितः ॥ ५४ ॥ स दुःखप्रतिघातार्थं हन्ति जन्तूननेकधा ।