महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व
Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva
by महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास
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Read in contextनार्थो न धर्मो न यशो योऽतीतमनुशोचति । अप्यभावेन युज्येत तच्चास्य न निवर्तते ॥ ७ ॥ जो बीती बातके लिये शोक करता है, उसे न तो अर्थकी प्राप्ति होती है न धर्मकी और न यशकी ही प्राप्ति होती है। वह उसके अभावका अनुभव करके केवल दुःख ही उठाता है। उससे अभाव दूर नहीं होता ॥ ७ ॥
गुणैर्भूतानि युज्यन्ते वियुज्यन्ते तथैव च । सर्वाणि नैतदेकस्य शोकस्थानं हि विद्यते ॥ ८ ॥ सभी प्राणियोंको उत्तम पदार्थोंसे संयोग और वियोग प्राप्त होते रहते हैं। किसी एकपर ही यह शोकका अवसर आता हो, ऐसी बात नहीं है ॥ ८ ॥
मृतं वा यदि वा नष्टं योऽतीतमनुशोचति । दुःखेन लभते दुःखं द्वावनर्थौ प्रपद्यते ॥ ९ ॥ जो मनुष्य भूतकालमें मरे हुए किसी व्यक्तिके लिये अथवा नष्ट हुई किसी वस्तुके लिये निरन्तर शोक करता है, वह एक दुःखसे दूसरे दुःखको प्राप्त होता है। इस प्रकार उसे दो अनर्थ भोगने पड़ते हैं ॥ ९ ॥
नाश्रु कुर्वन्ति ये बुद्ध्या दृष्ट्वा लोकेषु संततिम् । सम्यक् प्रपश्यतः सर्वे नाश्रुकर्मोपपद्यते ॥ १० ॥ जो मनुष्य संसारमें अपनी संतानकी मृत्यु हुई देखकर भी अश्रुपात नहीं करते, वे ही धीर हैं। सभी वस्तुओंपर समीचीन भावसे दृष्टिपात या विचार करनेपर किसीका भी आँसू बहाना युक्तिसंगत नहीं जान पड़ता है ॥ १० ॥
दुःखोपघाते शारीरे मानसे चाप्युपस्थिते । यस्मिन् न शक्यते कर्तुं यलस्तन्नानुचिन्तयेत् ॥ ११ ॥ यदि कोई शारीरिक या मानसिक दुःख उपस्थित हो जाय और उसे दूर करनेके लिये कोई यत्न किया जा सके अथवा किया हुआ यत्न काम न दे सके तो उसके लिये चिन्ता नहीं करनी चाहिये ॥ ११ ॥
भैषज्यमेतद् दुःखस्य यदेतन्नानुचिन्तयेत् । चिन्त्यमानं हि न व्येति भूयश्चापि प्रवर्धते ॥ १२ ॥ दुःख दूर करनेकी सबसे अच्छी दवा यही है कि उसका बार-बार चिन्तन न किया जाय। चिन्तन करनेसे वह घटता नहीं, बल्कि बढ़ता ही जाता है ॥ १२ ॥
प्रज्ञया मानसं दुःखं हन्याच्छारीरमौषधैः । एतद् विज्ञानसामर्थ्यं न बालैः समतामियात् ॥ १३ ॥ इसलिये मानसिक दुःखको बुद्धिके द्वारा विचारसे और शारीरिक कष्टको औषध-सेवनद्वारा नष्ट करना चाहिये। शास्त्रज्ञानके प्रभावसे ही ऐसा होना सम्भव है। दुःख पड़नेपर बालकोंकी तरह रोना उचित नहीं है ॥