महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व
Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva
by महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास
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Read in contextतृष्णाका कभी अन्त नहीं होता। संतोष ही परम सुख है, अतः पण्डितजन इस लोकमें संतोषको ही उत्तम धन समझते हैं ।। २१ ।। निमेषमात्रमपि हि वयो गच्छन्न तिष्ठति । स्वशरीरेष्वनित्येषु नित्यं किमनुचिन्तयेत् ॥ २२ ॥ आयु निरन्तर बीती जा रही है। वह पलभर भी ठहरती नहीं है। जब अपना शरीर ही अनित्य है, तब इस संसारकी किस वस्तुको नित्य समझा जाय ।। २२ ।। भूतेषु भावं संचिन्त्य ये बुद्ध्वा मनसः परम् । न शोचन्ति गताध्वानः पश्यन्तः परमां गतिम् ।। २३ ।। जो मनुष्य सब प्राणियोंके भीतर मनसे परे परमात्माकी स्थिति जानकर उन्हींका चिन्तन करते हैं, वे संसार-यात्रा समाप्त होनेपर परमपदका साक्षात्कार करते हुए शोकके पार हो जाते हैं ।। २३ ।। संचिन्वानकमेवैनं कामानामतितृप्तकम् । व्याघ्रः पशुमिवासाद्य मृत्युरादाय गच्छति ।। २४ ।। जैसे जंगलमें नयी-नयी घासकी खोजमें विचरते हुए अतृप्त पशुको सहसा व्याघ्र आकर दबोच लेता है, उसी प्रकार भोगोंकी खोजमें लगे हुए अतृप्त मनुष्यको मृत्यु उठा ले जाती है ।। २४ ।। तथाप्युपायं सम्पश्येद् दुःखस्य परिमोक्षणम् । अशोचन् नारभेच्चैव मुक्तश्चाव्यसनी भवेत् ।। २५ ।। तथापि सबको दुःखसे छूटनेका उपाय अवश्य सोचना चाहिये। जो शोक छोड़कर साधन आरम्भ करता है और किसी व्यसनमें आसक्त नहीं होता, वह निश्चय ही दुःखोंसे मुक्त हो जाता है ।। २५ ।। शब्दे स्पर्शे च रूपे च गन्धेषु च रसेषु च । नोपभोगात् परं किंचिद् धनिनो वाधनस्य च ।। २६ ।। धनी हो या निर्धन, सबको उपभोगकालमें ही शब्द, स्पर्श, रूप, रस और उत्तम गन्ध आदि विषयोंमें किंचित् सुखकी प्रतीति होती है, उपभोगके पश्चात् नहीं ।। २६ ।। प्राक्सम्प्रयोगाद् भूतानां नास्ति दुःखं परायणम् । विप्रयोगात् तु सर्वस्य न शोचेत् प्रकृतिस्थितः ।। २७ ।। प्राणियोंके एक-दूसरेसे संयोग होनेके पहले कोई दुःख नहीं रहता। जब संयोगके बाद वियोग होता है तभी सबको दुःख हुआ करता है। अतः अपने स्वरूपमें स्थित विवेकी पुरुषको किसीके वियोगमें कभी भी शोक नहीं करना चाहिये ।। २७ ।। धृत्या शिश्नोदरं रक्षेत् पाणिपादं च चक्षुषा । चक्षुःश्रोत्रे च मनसा मनो वाचं च विद्यया ।। २८ ।।