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महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva

by महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास

DevanagariSanskritpublished2,450 pages

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षट्षष्टितमोऽध्यायः

राजधर्मके पालनसे चारों आश्रमोंके धर्मका फल मिलनेका कथन

युधिष्ठिर उवाच

श्रुता मे कथिताः पूर्वे चत्वारो मानवाश्रमाः ।
व्याख्यानयित्वा व्याख्यानमेषामाचक्ष्व पृच्छतः ॥ १ ॥
**युधिष्ठिर बोले—**पितामह! आपने मानवमात्रके लिये जो चार आश्रम पहले बताये थे, वे सब मैंने सुन लिये। अब विस्तारपूर्वक इनकी व्याख्या कीजिये। मेरे प्रश्नके अनुसार इनका स्पष्टीकरण कीजिये ॥ १ ॥

भीष्म उवाच

विदिताः सर्व एवेह धर्मास्तव युधिष्ठिर ।
यथा मम महाबाहो विदिताः साधुसम्मताः ॥ २ ॥
**भीष्मजी बोले—**महाबाहु युधिष्ठिर! साधु पुरुषों-द्वारा सम्मानित समस्त धर्मोंका जैसा मुझे ज्ञान है, वैसा ही तुमको भी है ॥ २ ॥
यत्तु लिङ्गान्तरगतं पृच्छसे मां युधिष्ठिर ।
धर्मं धर्मभृतां श्रेष्ठ तन्निबोध नराधिप ॥ ३ ॥
धर्मात्माओंमें श्रेष्ठ राजा युधिष्ठिर! तथापि जो तुम विभिन्न लिङ्गों (हेतुओं) से रूपान्तरको प्राप्त हुए सूक्ष्म धर्मके विषयमें मुझसे पूछ रहे हो, उसके विषयमें कुछ निवेदन कर रहा हूँ, सुनो ॥ ३ ॥
सर्वाण्येतानि कौन्तेय विद्यन्ते मनुजर्षभ ।
साध्वाचारप्रवृत्तानां चातुराश्रम्यकारिणाम् ॥ ४ ॥
अकामद्वेषयुक्तस्य दण्डनीत्या युधिष्ठिर ।
समदर्शिनश्च भूतेषु भैक्ष्याश्रमपदं भवेत् ॥ ५ ॥
कुन्तीनन्दन! नरश्रेष्ठ! चारों आश्रमोंके धर्मोंका पालन करनेवाले सदाचारपरायण पुरुषोंको जिन फलोंकी प्राप्ति होती है, वे ही सब राग-द्वेष छोड़कर दण्डनीतिके अनुसार बर्ताव करनेवाले राजाको भी प्राप्त होते हैं। युधिष्ठिर! यदि राजा सब प्राणियोंपर समान दृष्टि रखनेवाला है तो उसे संन्यासियोंको प्राप्त होनेवाली गति प्राप्त होती है ॥ ४-५ ॥
वेत्ति ज्ञानविसर्गं च निग्रहानुग्रहं तथा ।
यथोक्तवृत्तेर्धीरस्य क्षेमाश्रमपदं भवेत् ॥ ६ ॥