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महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva

by महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास

DevanagariSanskritpublished2,450 pages

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नोपघातस्त्वया कार्यो राजन् मैत्रीमिहेच्छता ॥ ४७ ॥ मन्त्रीपदपर आते समय सियारने यह शर्त करा ली थी कि राजन्! यदि आप मुझसे मैत्री चाहते हैं तो किसीके बहकावेमें आकर मेरा विनाश न कर डालियेगा ॥

भीष्म उवाच

क्षुधितस्य मृगेन्द्रस्य भोक्तुमभ्युत्थितस्य च । भोजनायोपहर्तव्यं तन्मांसं नोपदृश्यते ॥ ४८ ॥ भीष्मजी कहते हैं—राजन्! उधर शेरको जब भूख लगी और वह भोजनके लिये उठा, तब उसके खानेके लिये जो परोसा जानेवाला था, वह मांस उसे नहीं दिखायी दिया ॥ ४८ ॥

मृगराजेन चाज्ञप्तं दृश्यतां चोर इत्युत । कृतकैश्चापि तन्मांसं मृगेन्द्रायोपवर्णितम् ॥ ४९ ॥ सचिवेनापनीतं ते विदुषा प्राज्ञमानिना । तब मृगराजने सेवकोंको आज्ञा दी कि चोरका पता लगाओ। तब जिनकी यह करतूत थी, उन्हीं लोगोंने उस मांसके बारेमें शेरको बताया—'महाराज! अपनेको अत्यन्त बुद्धिमान् और पण्डित माननेवाले आपके मन्त्री महोदयने ही इस मांसका अपहरण किया है' ॥ ४९ १/२ ॥

सरोषस्त्वथ शार्दूलः श्रुत्वा गोमायुचापलम् ॥ ५० ॥ बभूवामर्षितो राजा वधं चास्य व्यरोचयत् । सियारकी यह चपलता सुनकर शेर गुस्सेसे भर गया। उससे यह बात सही नहीं गयी; अतः मृगराजने उसका वध करनेका ही विचार कर लिया ॥ ५० १/२ ॥

छिद्रं तु तस्य तद् दृष्ट्वा प्रोचुस्ते पूर्वमन्त्रिणः ॥ ५१ ॥ सर्वेषामेव सोऽस्माकं वृत्तिभङ्गे प्रवर्तते । निश्चित्यैव पुनस्तस्य ते कर्माण्यपि वर्णयन् ॥ ५२ ॥ उसका यह छिद्र देखकर पहलेके मन्त्री आपसमें कहने लगे, वह हम सब लोगोंकी जीविका नष्ट करनेपर तुला हुआ है; अतः हम भी उससे बदला लें, ऐसा निश्चय करके वे उसके अपराधोंका वर्णन करने लगे— ॥

इदं तस्येदृशं कर्म किं तेन न कृतं भवेत् । श्रुतश्च स्वामिना पूर्वं यादृशो नैव तादृशः ॥ ५३ ॥ 'महाराज! जब उसके द्वारा ऐसा कर्म किया जा सकता है, तब वह और क्या नहीं कर सकता? स्वामीने पहले उसके बारेमें जैसा सुन रक्खा है, वह वैसा नहीं है ॥

वाङ्मात्रेणैव धर्मिष्ठः स्वभावेन तु दारुणः । धर्मच्छद्मा ह्ययं पापो वृथाचारपरिग्रहः ॥ ५४ ॥