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महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva

by महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास

DevanagariSanskritpublished2,450 pages

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तावत् तेन सदारेण जम्बुकेन स भक्षितः ॥ १४ ॥ वह पशु जबतक अपनी गर्दनको ऊपर-नीचे समेटनेका यत्न करता रहा, तबतक ही स्त्रीसहित सियारने उसे काटकर खा लिया ॥ १४ ॥

स हत्वा भक्षयित्वा च तमुष्ट्रं जम्बुकस्तदा । विगते वातवर्षे तु निश्चक्राम गुहामुखात् ॥ १५ ॥ इस प्रकार ऊँटको मारकर खा जानेके पश्चात् जब आँधी और वर्षा बंद हो गयी, तब वह गीदड़ गुफाके मुहानेसे निकल गया ॥ १५ ॥

एवं दुर्बुद्धिना प्राप्तमुष्ट्रेण निधनं तदा । आलस्यस्य क्रमात् पश्य महान्तं दोषमागतम् ॥ १६ ॥ इस तरह उस मूर्ख ऊँटकी मृत्यु हो गयी। देखो, उसके आलस्यके क्रमसे कितना महान् दोष प्राप्त हो गया ॥

त्वमप्येवंविधं हित्वा योगेन नियतेन्द्रियः । वर्तस्व बुद्धिमूलं तु विजयं मनुरब्रवीत् ॥ १७ ॥ इसलिये तुम्हें भी ऐसे आलस्यको त्याग करके इन्द्रियोंको वशमें रखते हुए बुद्धिपूर्वक बर्ताव करना उचित है। मनुजीका कथन है कि 'विजयका मूल बुद्धि ही है' ॥ १७ ॥

बुद्धिश्रेष्ठानि कर्माणि बाहुमध्यानि भारत । तानि जङ्घाजघन्यानि भारप्रत्यवराणि च ॥ १८ ॥ भारत! बुद्धिबलसे किये गये कार्य श्रेष्ठ हैं। बाहुबलसे किये जानेवाले कार्य मध्यम हैं। जाँघ अर्थात् पैरके बलसे किये गये कार्य जघन्य (अधम कोटिके) हैं तथा मस्तकसे भार ढोनेका कार्य सबसे निम्न श्रेणीका है ॥ १८ ॥

राज्यं तिष्ठति दक्षस्य संगृहीतेन्द्रियस्य च । आर्तस्य बुद्धिमूलं हि विजयं मनुरब्रवीत् ॥ १९ ॥ जो जितेन्द्रिय और कार्यदक्ष है, उसीका राज्य स्थिर रहता है। मनुजीका कथन है कि संकटमें पड़े हुए राजाकी विजयका मूल बुद्धि-बल ही है ॥ १९ ॥

गुह्यं मन्त्रं श्रुतवतः सुसहायस्य चानघ । परीक्ष्यकारिणो ह्यर्थास्तिष्ठन्तीह युधिष्ठिर । सहाययुक्तेन मही कृत्स्ना शक्या प्रशासितुम् ॥ २० ॥ निष्पाप युधिष्ठिर! जो गुप्त मन्त्रणा सुनता है, जिसके सहायक अच्छे हैं तथा जो भलीभाँति जान-बूझकर कोई कार्य करता है, उसके पास ही धन स्थिर रहता है। सहायकोंसे सम्पन्न नरेश ही समूची पृथ्वीका शासन कर सकता है ॥ २० ॥

इदं हि सद्भिः कथितं विधिज्ञैः पुरा महेन्द्रप्रतिमप्रभाव । मयापि चोक्तं तव शास्त्रदृष्ट्या