महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व
Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva
by महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास
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Read in contextतथा प्रजापतिर्ब्रह्मा अव्यक्तः प्रभुरव्ययः । येनेदं निखिलं विश्वं जनितं स्थावरं चरम् ॥ १५ ॥ जिन्होंने इस सम्पूर्ण चराचर जगत्की सृष्टि की है, वे अव्यक्तस्वरूप अविनाशी प्रजापति भगवान् ब्रह्माजी भी ब्राह्मण ही हैं ॥ १५ ॥
अण्डजातं तु ब्रह्माणं केचिदिच्छन्त्यपण्डिताः । अण्डाद् भिन्नाद् बभुः शैला दिशोऽम्भःपृथिवी दिवम् ॥ १६ ॥ कुछ मूर्ख मनुष्य ब्रह्माजीको भी अण्डसे उत्पन्न मानते हैं। (उनकी मान्यता है कि) फूटे हुए अण्डसे पर्वत, दिशाएँ, जल, पृथ्वी और स्वर्गकी उत्पत्ति हुई है ॥ १६ ॥
द्रष्टव्यं नैतदेवं हि कथं जायेदजो हि सः । स्मृतमाकाशमण्डं तु तस्माज्जातः पितामहः ॥ १७ ॥ परंतु ऐसा नहीं समझना चाहिये; क्योंकि जो अजन्मा है, वह जन्म कैसे ले सकता है? फिर भी जो उन्हें अण्डज कहा जाता है, उसका अभिप्राय यों समझना चाहिये। महाकाश ही यहाँ 'अण्ड' है, उससे पितामह प्रकट हुए हैं (इसलिये वे 'अण्डज' हैं) ॥ १७ ॥
तिष्ठेत् कथमिति ब्रूहि न किंचिद्धि तदा भवेत् । अहङ्कार इति प्रोक्तः सर्वतेजोगतः प्रभुः ॥ १८ ॥ यदि कहो, 'ब्रह्मा आकाशसे प्रकट हुए हैं तो किस आधारपर ठहरते हैं, यह बताइये; क्योंकि उस समय कोई दूसरा आधार नहीं रहता' तो इसके उत्तरमें निवेदन है कि ब्रह्मा वहाँ अहंकारस्वरूप बताये गये, जो सम्पूर्ण तेजोंमें व्याप्त एवं समर्थ बताये गये हैं ॥ १८ ॥
नास्त्यण्डमस्ति तु ब्रह्मा स राजा लोकभावनः । इत्युक्तः स तदा तूष्णीमभूद् वायुस्ततोऽब्रवीत् ॥ १९ ॥ वास्तवमें 'अण्ड' नामकी कोई वस्तु नहीं है। फिर भी ब्रह्माजीका अस्तित्व है, क्योंकि वे ही जगत्के उत्पादक हैं। उनके ऐसा कहनेपर राजा कार्तवीर्य अर्जुन चुप हो गये, तब वायु देवता पुनः उनसे बोले ॥ १९ ॥
इति श्रीमहाभारते अनुशासनपर्वणि दानधर्मपर्वणि पवनार्जुनसंवादे त्रिपञ्चाशदधिकशततमोऽध्यायः ॥ १५३ ॥ इस प्रकार श्रीमहाभारत अनुशासनपर्वके अन्तर्गत दानधर्मपर्वमें वायुदेवता और कार्तवीर्य अर्जुनका संवादविषयक एक सौ तिरपनवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १५३ ॥