महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व
Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva
by महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास
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Read in context‘इन्द्रको भी उन दैत्योंसे भिड़कर महान् क्लेश उठाना पड़ा; अतः वे वसिष्ठजीकी शरणमें गये। तब उन भगवान् वसिष्ठ मुनिने, जो बड़े ही दयालु थे, देवताओंको दुखी जानकर उन्हें अभयदान दे दिया और बिना किसी प्रयत्नके ही अपने तेजसे उन समस्त खली नामके दानवोंको दग्ध कर डाला ।। २१-२२ ।।
कैलासं प्रस्थितां चैव नदीं गङ्गां महातपाः ।
आनयत् तत्सरो दिव्यं तया भिन्नं च तत्सरः ।। २३ ।।
सरो भिन्नं तया नद्या सरयूः सा ततोऽभवत् ।
हताश्च खलिनो यत्र स देशः खलिनोऽभवत् ।। २४ ।।
‘इतना ही नहीं—वे महातपस्वी मुनि कैलासकी ओर प्रस्थित हुई गंगा नदीको उस दिव्य सरोवरमें ले आये। गंगाजीने उसमें आते ही उस सरोवरका बाँध तोड़ डाला। गंगासे सरोवरका भेदन होनेपर जो स्रोत निकला, वही सरयू नदीके नामसे प्रसिद्ध हुआ। जिस स्थानपर खली नामक दानव मारे गये, वह देश खलिन नामसे विख्यात हुआ ।। २३-२४ ।।
एवं सेन्द्रा वसिष्ठेन रक्षितास्त्रिदिवौकसः ।
ब्रह्मदत्तवराश्चैव हता दैत्या महात्मना ।। २५ ।।
‘इस प्रकार महात्मा वसिष्ठने इन्द्रसहित देवताओंकी रक्षा की और ब्रह्माजीने जिनके लिये वर दिया था, ऐसे दैत्योंका भी संहार कर डाला ।। २५ ।।
एतत् कर्म वसिष्ठस्य कथितं हि मयानघ ।
ब्रवीम्यहं ब्रूहि वा त्वं वसिष्ठात् क्षत्रियं वरम् ।। २६ ।।
‘निष्पाप नरेश! मैंने ब्रह्मर्षि वसिष्ठजीके इस कर्मका वर्णन किया है। मैं कहता हूँ, ब्राह्मण श्रेष्ठ है। यदि वसिष्ठसे बड़ा कोई क्षत्रिय है तो बताओ’ ।। २६ ।।
इति श्रीमहाभारते अनुशासनपर्वणि दानधर्मपर्वणि पवनार्जुनसंवादे पञ्चपञ्चाशदधिकशततमोऽध्यायः ।। १५५ ।।
इस प्रकार श्रीमहाभारत अनुशासनपर्वके अन्तर्गत दानधर्मपर्वमें वायु देवता और कार्तवीर्य अर्जुनका संवादविषयक एक सौ पचपनवाँ अध्याय पूरा हुआ ।। १५५ ।।