BharatKosha
महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva

by महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास

DevanagariSanskritpublished2,566 pages

Page 1486 of 2566

Read in context
Page 1486

कथं रक्षामि भवतस्तेऽब्रुवंश्चन्द्रमा भव । तिमिरघ्नश्च सविता दस्युहन्ता च नो भव ॥ ७ ॥ अत्रिने कहा—'मैं किस प्रकार आपलोगोंकी रक्षा करूँ? देवता बोले—'आप अन्धकारको नष्ट करनेवाले चन्द्रमा और सूर्यका रूप धारण कीजिये और हमारे शत्रु बने हुए इन डाकू दानवोंका नाश कर डालिये' ॥ ७ ॥

एवमुक्तस्तदात्रिर्वै तमोनुदभवच्छशी । अपश्यत् सौम्यभावाच्च सोमवत् प्रियदर्शनः ॥ ८ ॥ दृष्ट्वा नातिप्रभं सोमं तथा सूर्य च पार्थिव । प्रकाशमकरोत्रिस्तपसा स्वेन संयुगे ॥ ९ ॥ जगद् वितिमिरं चापि प्रदीप्तमकरोत् तदा ॥ १० ॥ पृथ्वीनाथ! देवताओंके ऐसा कहनेपर अत्रिने अन्धकारको दूर करनेवाले चन्द्रमाका रूप धारण किया और सोमके समान देखनेमें प्रिय लगने लगे। उन्होंने शान्तभावसे देवताओंकी ओर देखा। उस समय चन्द्रमा और सूर्यकी प्रभा मन्द देखकर अत्रिने अपनी तपस्यासे उस युद्धभूमिमें प्रकाश फैलाया तथा सम्पूर्ण जगत्‌को अन्धकारशून्य एवं आलोकित कर दिया ॥ ८—१० ॥

व्यजयच्छत्रुसंघांश्च देवानां स्वेन तेजसा । अत्रिणा दह्यमानांस्तान् दृष्ट्वा देवा महासुरान् ॥ ११ ॥ पराक्रमैस्तेऽपि तदा व्यघ्नन्नत्रिसुरक्षिताः । उद्भासितश्च सविता देवास्त्राता हतासुराः ॥ १२ ॥ उन्होंने अपने तेजसे ही देवताओंके शत्रुओंको परास्त कर दिया। अत्रिके तेजसे उन महान् असुरोंको दग्ध होते देख अत्रिसे सुरक्षित हुए देवताओंने भी उस समय पराक्रम करके उन दैत्योंको मार डाला। अत्रिने सूर्यको तेजस्वी बनाया, देवताओंका उद्धार किया और असुरोंको नष्ट कर दिया ॥ ११-१२ ॥

अत्रिणा त्वथ सामर्थ्यं कृतमुत्तमतेजसा । द्विजेनाग्निद्वितीयेन जपता चर्मवाससा ॥ १३ ॥ फलभक्षेण राजर्षे पश्य कर्मात्रिणा कृतम् । तस्यापि विस्तरेणोक्तं कर्मात्रेः सुमहात्मनः । ब्रवीम्यहं ब्रूहि वा त्वमत्रितः क्षत्रियं वरम् ॥ १४ ॥ अत्रि मुनि गायत्रीका जप करनेवाले, मृगचर्मधारी, फलाहारी, अग्निहोत्री और उत्तम तेजसे युक्त ब्राह्मण हैं। उन्होंने जो सामर्थ्य दिखलाया, जैसा महान् कर्म किया, उसपर दृष्टिपात करो। मैंने उन उत्तम महात्मा अत्रिका भी कर्म विस्तारपूर्वक बताया है। मैं कहता हूँ ब्राह्मण श्रेष्ठ है। तुम बताओ अत्रिसे श्रेष्ठ कौन क्षत्रिय है? ॥ १३-१४ ॥

इत्युक्तस्त्वर्जुनस्तूष्णीमभूद् वायुस्ततोऽब्रवीत् ।

महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व · Page 1486 of 2566 · BharatKosha