महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व
Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva
by महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास
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Read in contextसप्तमोऽध्यायः
संवर्त और मरुत्तकी बातचीत, मरुत्तके विशेष आग्रहपर संवर्तका यज्ञ करानेकी स्वीकृति देना
संवर्त उवाच
कथमस्मि त्वया ज्ञातः केन वा कथितोऽस्मि ते ।
एतदाचक्ष्व मे तत्त्वमिच्छसे चेन्मम प्रियम् ॥ १ ॥
संवर्त बोले— राजन्! तुमने मुझे कैसे पहचाना? किसने तुम्हें मेरा परिचय दिया है? यदि मेरा प्रिय चाहते हो तो यह सब मुझे ठीक-ठीक बताओ ॥ १ ॥
सत्यं ते ब्रुवतः सर्वे सम्पत्स्यन्ते मनोरथाः ।
मिथ्या च ब्रुवतो मूर्धा शतधा ते स्फुटिष्यति ॥ २ ॥
यदि सच-सच बता दोगे तो तुम्हारे सारे मनोरथ पूर्ण होंगे और यदि झूठ बोलोगे तो तुम्हारे मस्तकके सैकड़ों टुकड़े हो जायँगे ॥ २ ॥
मरुत्त उवाच
नारदेन भवान् मह्यमाख्यातो ह्यटता पथि ।
गुरुपुत्रो ममेति त्वं ततो मे प्रीतिरुत्तमा ॥ ३ ॥
मरुत्तने कहा— मुने! भ्रमणशील नारदजीने रास्तेमें मुझे आपका परिचय दिया और पता बताया। आप मेरे गुरु अंगिराके पुत्र हैं, यह जानकर मुझे बड़ी प्रसन्नता हुई है ॥ ३ ॥
संवर्त उवाच
सत्यमेतद् भवानाह स मां जानाति सत्रिणम् ।
कथयस्व तदेतन्मे क्व नु सम्प्रति नारदः ॥ ४ ॥
संवर्त बोले— राजन्! तुम ठीक कहते हो, नारदको यह मालूम है कि मैं यज्ञ कराना जानता हूँ और गुप्त वेषमें घूम रहा हूँ। अच्छा यह तो बताओ, इस समय नारद कहाँ हैं? ॥ ४ ॥
मरुत्त उवाच
भवन्तं कथयित्वा तु मम देवर्षिसत्तमः ।
ततो मामभ्यनुज्ञाय प्रविष्टो हव्यवाहनम् ॥ ५ ॥
मरुत्तने कहा— मुने! मुझे आपका परिचय और पता बताकर देवर्षिशिरोमणि नारद मुझे जानेकी आज्ञा दे स्वयं अग्निमें प्रवेश कर गये थे ॥ ५ ॥
व्यास उवाच