महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व
Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva
by महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास
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Read in contextबृहस्पतिरुवाच
मरुत्तमाहुर्मघवन् यक्ष्यमाणं महायज्ञेनोत्तमदक्षिणेन । संवर्तो याजयतीति मे श्रुतं तदिच्छामि न स तं याजयेत ॥ ४ ॥ बृहस्पतिजी बोले— मघवन्! लोग कहते हैं कि महाराज मरुत्त उत्तम दक्षिणाओंसे युक्त एक महान् यज्ञ करने जा रहे हैं तथा यह भी मेरे सुननेमें आया है कि संवर्त ही आचार्य होकर वह यज्ञ करायेंगे। परंतु मेरी इच्छा है कि वे उस यज्ञको न कराने पावें ॥ ४ ॥
इन्द्र उवाच
सर्वान् कामाननुयातोऽसि विप्र यस्त्वं देवानां मन्त्रवित्सुपुरोधाः । उभौ च ते जरामृत्यू व्यतीतौ किं संवर्तस्तव कर्ताद्य विप्र ॥ ५ ॥ इन्द्रने कहा— ब्रह्मन्! सम्पूर्ण मनोवांछित भोग आपको प्राप्त हैं; क्योंकि आप देवताओंके मन्त्रज्ञ पुरोहित हैं। आपने जरा और मृत्यु दोनोंको जीत लिया है। फिर संवर्त आपका क्या कर सकते हैं? ॥ ५ ॥
बृहस्पतिरुवाच
देवैः सह त्वमसुरान् प्रणुद्य जिघांससे चाप्युत सानुबन्धान् । यं यं समृद्धं पश्यसि तत्र तत्र दुःखं सपत्नेषु समृद्धिभावः ॥ ६ ॥ बृहस्पतिजी बोले— देवराज! तुम असुरोंमेंसे जिस-जिसको समृद्धिशाली देखते हो, उसके ऊपर भिन्न-भिन्न स्थानोंमें देवताओंके साथ आक्रमण करके उन सभी असुरोंको मिटा डालना चाहते हो। वास्तवमें शत्रुओंकी समृद्धि दुःखका कारण होती है ॥ ६ ॥
अतोऽस्मि देवेन्द्र विवर्णरूपः सपत्नो मे वर्धते तन्निशम्य । सर्वोपायैर्मघवन् संनियच्छ संवर्तं वा पार्थिवं वा मरुत्तम् ॥ ७ ॥ देवेन्द्र! इसीसे मैं भी उदास हो रहा हूँ। मेरा शत्रु संवर्त बढ़ रहा है, यह सुनकर मेरी चिन्ता बढ़ गयी है। अतः मघवन्! तुम सभी सम्भव उपायोंद्वारा संवर्त और राजा मरुत्तको कैद कर लो ॥ ७ ॥