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महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva

by महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास

DevanagariSanskritpublished2,566 pages

Page 1621 of 2566

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Page 1621

नरेश्वर! मैं अभी उन्हें स्तम्भित करता हूँ; अतः तुम इन्द्रसे न डरो। मैंने सम्पूर्ण देवताओंके अस्त्र-शस्त्र भी क्षीण कर दिये हैं। चाहे दसों दिशाओंमें वज्र गिरे, आँधी चले, इन्द्र स्वयं ही वर्षा बनकर सम्पूर्ण वनोंमें निरन्तर बरसते रहें, आकाशमें व्यर्थ ही जलप्लावन होता रहे और बिजली चमके तो भी तुम भयभीत न होओ॥ वह्निर्देवस्त्रातु वा सर्वतस्ते कामान् सर्वान् वर्षतु वासवो वा । वज्रं तथा स्थापयतां वधाय महाघोरं प्लवमानं जलौघैः ॥ १५ ॥ अग्निदेव तुम्हारी सब ओरसे रक्षा करें। देवराज इन्द्र तुम्हारे लिये जलकी नहीं, सम्पूर्ण कामनाओंकी वर्षा करें और तुम्हारे वधके लिये उठे हुए और जलराशिके साथ चंचल गतिसे चले हुए महाघोर वज्रको वे देवेन्द्र अपने हाथमें ही रखे रहें ॥ १५ ॥

मरुत्त उवाच

घोरः शब्दः श्रूयते वै महास्वनो वज्रस्यैष सहितो मारुतेन । आत्मा हि मे प्रव्यथते मुहुर्मुहु- र्न मे स्वास्थ्यं जायते चाद्य विप्र ॥ १६ ॥ **मरुत्तने कहा—**विप्रवर! आँधीके साथ ही जोर-जोरसे होनेवाली वज्रकी भयंकर गड़गड़ाहट सुनायी दे रही है। इससे रह-रहकर मेरा हृदय काँप उठता है। आज मनमें तनिक भी शान्ति नहीं है ॥ १६ ॥

संवर्त उवाच

वज्रादुग्राद् व्येतु भयं तवाद्य वातो भूत्वा हन्मि नरेन्द्र वज्रम् । भयं त्यक्त्वा वरमन्यं वृणीष्व कं ते कामं मनसा साधयामि ॥ १७ ॥ **संवर्तने कहा—**नरेन्द्र! तुम्हें इन्द्रके भयंकर वज्रसे आज भयभीत नहीं होना चाहिये। मैं वायुका रूप धारण करके अभी इस वज्रको निष्फल किये देता हूँ। तुम भय छोड़कर मुझसे कोई दूसरा वर माँगो। बताओ, मैं तुम्हारी कौन-सी मानसिक इच्छा पूर्ण करूँ? ॥ १७ ॥

मरुत्त उवाच

इन्द्रः साक्षात् सहसाभ्येतु विप्र हविर्यज्ञे प्रतिगृह्णातु चैव ।