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महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva

by महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास

DevanagariSanskritpublished2,566 pages

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जैसे मनुष्य सपनेमें किसी अपरिचित पुरुषको देखकर जब पुनः उसे जाग्रत् अवस्थामें देखता है, तब तुरंत पहचान लेता है कि 'यह वही है।' उसी प्रकार साधन-परायण योगी समाधि-अवस्थामें आत्माको जिस रूपमें देखता है, उसी रूपमें उसके बाद भी देखता रहता है ॥

इषीकां च यथा मुञ्जात् कश्चिन्निष्कृष्य दर्शयेत् । योगी निष्कृष्य चात्मानं तथा पश्यति देहतः ॥ २२ ॥ जैसे कोई मनुष्य मूँजसे सींकको अलग करके दिखा दे, वैसे ही योगी पुरुष आत्माको इस देहसे पृथक् करके देखता है ॥ २२ ॥

मुञ्जं शरीरमित्याहुरिषीकामात्मनि श्रिताम् । एतन्निदर्शनं प्रोक्तं योगविद्भिरनुत्तमम् ॥ २३ ॥ यहाँ शरीरको मूँज कहा गया है और आत्माको सींक। योगवेत्ताओंने देह और आत्माके पार्थक्यको समझनेके लिये यह बहुत उत्तम दृष्टान्त दिया है ॥ २३ ॥

यदा हि युक्तमात्मानं सम्यक् पश्यति देहभृत् । न तस्येहेश्वरः कश्चित् त्रैलोक्यस्यापि यः प्रभुः ॥ २४ ॥ देहधारी जीव जब योगके द्वारा आत्माका यथार्थ-रूपसे दर्शन कर लेता है, उस समय उसके ऊपर त्रिभुवनके अधीश्वरका भी आधिपत्य नहीं रहता ॥ २४ ॥

अन्यान्य़ांश्चैव तनवो यथेष्टं प्रतिपद्यते । विनिवृत्य जरां मृत्युं न शोचति न हृष्यति ॥ २५ ॥ वह योगी अपनी इच्छाके अनुसार विभिन्न प्रकारके शरीर धारण कर सकता है, बुढ़ापा और मृत्युको भी भगा देता है, वह न कभी शोक करता है न हर्ष ॥ २५ ॥

देवानापि देवत्वं युक्तः कारयते वशी । ब्रह्म चाव्ययमाप्नोति हित्वा देहमशाश्वतम् ॥ २६ ॥ अपनी इन्द्रियोंको वशमें रखनेवाला योगी पुरुष देवताओंका भी देवता हो सकता है। वह इस अनित्य शरीरका त्याग करके अविनाशी ब्रह्मको प्राप्त होता है ॥ २६ ॥

विनश्यत्सु च भूतेषु न भयं तस्य जायते । क्लिश्यमानेषु भूतेषु न स क्लिश्यति केनचित् ॥ २७ ॥ सम्पूर्ण प्राणियोंका विनाश होनेपर भी उसे भय नहीं होता। सबके क्लेश उठानेपर भी उसको किसीसे क्लेश नहीं पहुँचता ॥ २७ ॥

दुःखशोकमयैर्घोरैः सङ्गस्नेहसमुद्भवैः । न विचाल्यति युक्तात्मा निःस्पृहः शान्तमानसः ॥ २८ ॥ शान्तचित्त एवं निःस्पृह योगी आसक्ति और स्नेहसे प्राप्त होनेवाले भयंकर दुःख-शोक तथा भयसे विचलित नहीं होता ॥ २८ ॥

नैनं शस्त्राणि विध्यन्ते न मृत्युश्चास्य विद्यते ।