महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व
Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva
by महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास
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Read in contextनिर्जन वनमें इन्द्रिय-समुदायको वशमें करके एकाग्रचित्त हो शब्दशून्य अपने शरीरके बाहर और भीतर प्रत्येक अंगमें परिपूर्ण परब्रह्म परमात्माका चिन्तन करे ॥ ३६ ॥
दन्तांस्तालु च जिह्वां च गलं ग्रीवां तथैव च । हृदयं चिन्तयेच्चापि तथा हृदयबन्धनम् ॥ ३७ ॥
दन्त, तालु, जिह्वा, गला, ग्रीवा, हृदय तथा हृदय-बन्धन (नाड़ीमार्ग)-को भी परमात्मरूपसे चिन्तन करे ॥ ३७ ॥
इत्युक्तः स मया शिष्यो मेधावी मधुसूदन । पप्रच्छ पुनरेवेमं मोक्षधर्मं सुदुर्वचम् ॥ ३८ ॥
मधुसूदन! मेरे ऐसा कहनेपर उस मेधावी शिष्यने पुनः जिसका निरूपण करना अत्यन्त कठिन है, उस मोक्षधर्मके विषयमें पूछा— ॥ ३८ ॥
भुक्तं भुक्तमिदं कोष्ठे कथमन्नं विपच्यते । कथं रसत्वं व्रजति शोणितत्वं कथं पुनः ॥ ३९ ॥
‘यह बारंबार खाया हुआ अन्न उदरमें पहुँचकर कैसे पचता है? किस तरह उसका रस बनता है और किस प्रकार वह रक्तके रूपमें परिणत हो जाता है? ॥ ३९ ॥
तथा मांसं च मेदश्च स्नाय्वस्थीनि च योषिति । कथमेतानि सर्वाणि शरीराणि शरीरिणाम् ॥ ४० ॥ वर्धते वर्धमानस्य वर्धते च कथं बलम् । निरोधानां निर्गमनं मलानां च पृथक् पृथक् ॥ ४१ ॥
‘स्त्री-शरीरमें मांस, मेदा, स्नायु और हड्डियाँ कैसे होती हैं? देहधारियोंके ये समस्त शरीर कैसे बढ़ते हैं? बढ़ते हुए शरीरका बल कैसे बढ़ता है? जिनका सब ओरसे अवरोध है, उन मलोंका पृथक्-पृथक् निःसारण कैसे होता है? ॥ ४०-४१ ॥
कुतो वायं प्रश्वसिति उच्छ्वसित्यपि वा पुनः । कं च देशमधिष्ठाय तिष्ठत्यात्मायमात्मनि ॥ ४२ ॥
‘यह जीव कैसे साँस लेता, कैसे उच्छ्वास खींचता और किस स्थानमें रहकर इस शरीरमें सदा विद्यमान रहता है? ॥ ४२ ॥
जीवः कथं वहति च चेष्टमानः कलेवरम् । किं वर्णं कीदृशं चैव निवेशयति वै पुनः ॥ ४३ ॥ याथातथ्येन भगवन् वक्तुमर्हसि मेऽनघ ।
‘चेष्टाशील जीवात्मा इस शरीरका भार कैसे वहन करता है? फिर कैसे और किस रंगके शरीरको धारण करता है। निष्पाप भगवन्! यह सब मुझे यथार्थरूपसे बताइये’ ॥ ४३ ½ ॥
इति सम्परिपृष्टोऽहं तेन विप्रेण माधव ॥ ४४ ॥ प्रत्यब्रुवं महाबाहो यथाश्रुतमरिंदम ।