महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व
Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva
by महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास
Page 1682 of 2566
Read in contextमनसे, वाणीसे तथा क्रियाद्वारा जो भी शुभ या अशुभ कार्य होता है, वह तथा जन्म, स्थिति, विनाश एवं शरीरभेद आदि कर्म प्राणियोंमें विद्यमान हैं ॥ ८ ॥
रक्षोभिर्वध्यमानेषु दृश्यद्रव्येषु वर्त्मसु । आत्मस्थमात्मना तेभ्यो दृष्टमायतनं मया ॥ ९ ॥ ‘जब राक्षसों—दुर्जनोंने जहाँ सोम और घृत आदि दृश्य द्रव्योंका उपयोग होता है, उन कर्म-मार्गोंका विनाश आरम्भ कर दिया, तब मैंने उनसे विरक्त होकर स्वयं ही अपने भीतर स्थित हुए आत्माके स्थानको देखा ॥ ९ ॥
यत्र तद् ब्रह्म निर्द्वन्द्वं यत्र सोमः सहाग्निना । व्यवायं कुरुते नित्यं धीरो भूतानि धारयन् ॥ १० ॥ ‘जहाँ द्वन्द्वोंसे रहित वह परब्रह्म परमात्मा विराजमान है, जहाँ सोम अग्निके साथ नित्य समागम करता है तथा जहाँ सब भूतोंको धारण करनेवाला धीर समीर निरन्तर चलता रहता है ॥ १० ॥
यत्र ब्रह्मादयो युक्तास्तदक्षरमुपासते । विद्वांसः सुव्रता यत्र शान्तात्मानो जितेन्द्रियाः ॥ ११ ॥ ‘जहाँ ब्रह्मा आदि देवता तथा उत्तम व्रतका पालन करनेवाले शान्तचित्त जितेन्द्रिय विद्वान् योगयुक्त होकर उस अविनाशी ब्रह्मकी उपासना करते हैं ॥ ११ ॥
घ्राणेन न तदाघ्रेयं नास्वाद्यं चैव जिह्वया । स्पर्शनेन तदस्पृश्यं मनसा त्ववगम्यते ॥ १२ ॥ ‘वह अविनाशी ब्रह्म घ्राणेन्द्रियसे सूँघने और जिह्वाद्वारा आस्वादन करनेयोग्य नहीं है। स्पर्शनेन्द्रिय—त्वचाद्वारा उसका स्पर्श भी नहीं किया जा सकता; केवल बुद्धिके द्वारा उसका अनुभव किया जा सकता है ॥ १२ ॥
चक्षुषामविषह्यं च यत् किंचिच्छ्रवणात् परम् । अगन्धरसस्पर्शमरूपाशब्दलक्षणम् ॥ १३ ॥ ‘वह नेत्रोंका विषय नहीं हो सकता। वह अनिर्वचनीय परब्रह्म श्रवणेन्द्रियकी पहुँचसे सर्वथा परे है। गन्ध, रस, स्पर्श, रूप और शब्द आदि कोई भी लक्षण उसमें उपलब्ध नहीं है ॥ १३ ॥
यतः प्रवर्तते तन्त्रं यत्र च प्रतितिष्ठति । प्राणोऽपानः समानश्च व्यानश्चोदान एव च ॥ १४ ॥ तत एव प्रवर्तन्ते तदेव प्रविशन्ति च । ‘उसीसे सृष्टि आदिका विस्तार होता है और उसीमें उसकी स्थिति है। प्राण, अपान, समान, व्यान और उदान—से उसीसे प्रकट होते और फिर उसीमें प्रविष्ट हो जाते हैं ॥ १४ ॥
समानव्यानयोर्मध्ये प्राणापानौ विचेरतुः ॥ १५ ॥