महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व
Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva
by महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास
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Read in context‘श्रेष्ठ कर्म किस प्रकार करना चाहिये? मनुष्य पापसे किस प्रकार छूटता है? कौन-से मार्ग हमारे लिये कल्याणकारक हैं? सत्य क्या है? और पाप क्या है? ।। २९ ।। कौ चोभौ कर्मणां मार्गौ प्राप्नुयुर्दक्षिणोत्तरौ । प्रलयं चापवर्गं च भूतानां प्रभवाप्ययौ ।। ३० ।। ‘तथा कर्मोंके वे दो मार्ग कौन-से हैं, जिनसे मनुष्य दक्षिणायन और उत्तरायण गतिको प्राप्त होते हैं? प्रलय और मोक्ष क्या हैं? एवं प्राणियोंके जन्म और मरण क्या हैं?’ ।। ३० ।। इत्युक्तः स मुनिश्रेष्ठैर्यदाह प्रपितामहः । तत् तेऽहं सम्प्रवक्ष्यामि शृणु शिष्य यथागमम् ।। ३१ ।। शिष्य! उन मुनिश्रेष्ठ महर्षियोंके द्वारा इस प्रकार कहे जानेपर उन प्रपितामह ब्रह्माजीने जो कुछ कहा, वह मैं तुम्हें शास्त्रानुसार पूर्णतया बताऊँगा, उसे सुनो ।। ३१ ।।
ब्रह्मोवाच सत्याद् भूतानि जातानि स्थावराणि चराणि च । तपसा तानि जीवन्ति इति तद् वित्त सुव्रताः । स्वां योनिं समतिक्रम्य वर्तन्ते स्वेन कर्मणा ।। ३२ ।। ब्रह्माजीने कहा— उत्तम व्रतका पालन करनेवाले महर्षियो! ऐसा जानो कि चराचर जीव सत्यस्वरूप परमात्मासे उत्पन्न हुए हैं और तपरूप कर्मसे जीवन धारण करते हैं। वे अपने कारणस्वरूप ब्रह्मको भूलकर अपने कर्मोंके अनुसार आवागमनके चक्रमें घूमते हैं ।। ३२ ।। सत्यं हि गुणसंयुक्तं नियतं पञ्चलक्षणम् ।। ३३ ।। क्योंकि गुणोंसे युक्त हुआ सत्य ही पाँच लक्षणोंवाला निश्चित किया गया है ।। ३३ ।। ब्रह्म सत्यं तपः सत्यं सत्यं चैव प्रजापतिः । सत्याद् भूतानि जातानि सत्यं भूतमयं जगत् ।। ३४ ।। ब्रह्म सत्य है, तप सत्य है और प्रजापति भी सत्य है। सत्यसे ही सम्पूर्ण भूतोंका जन्म हुआ है। यह भौतिक जगत् सत्यरूप ही है ।। ३४ ।। तस्मात् सत्यमया विप्रा नित्यं योगपरायणाः । अतीतक्रोधसंतापा नियता धर्मसेविनः ।। ३५ ।। इसलिये सदा योगमें लगे रहनेवाले, क्रोध और संतापसे दूर रहनेवाले तथा नियमोंका पालन करनेवाले धर्मसेवी ब्राह्मण सत्यका आश्रय लेते हैं ।। ३५ ।। अन्योन्यनियतान् वैद्यान् धर्मसेतुप्रवर्तकान् । तानहं सम्प्रवक्ष्यामि शाश्वताँल्लोकभावनान् ।। ३६ ।। जो परस्पर एक-दूसरेको नियमके अंदर रखनेवाले, धर्म-मर्यादाके प्रवर्तक और विद्वान् हैं, उन ब्राह्मणोंके प्रति मैं लोक-कल्याणकारी सनातन धर्मोंका उपदेश करूँगा ।। ३६ ।।