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महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva

by महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास

DevanagariSanskritpublished2,566 pages

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इसके बाद यक्षराज कुबेरको, मणिभद्रको, अन्यान्य यक्षोंको और भूतोंके अधिपतियोंको खिचड़ी, फलके गूदे तथा तिलमिश्रित जलकी अंजलियाँ निवेदन करके उनकी पूजा सम्पन्न की ।। ६-७ ।।
ओदनं कुम्भशः कृत्वा पुरोधाः समुपाहरत् ।
ब्राह्मणेभ्यः सहस्राणि गवां दत्त्वा तु भूमिपः ।। ८ ।।
नक्तंचराणां भूतानां व्यादिदेश बलिं तदा ।
तदनन्तर पुरोहितने घड़ोंमें भात भरकर बलि अर्पित की। इसके बाद भूपालने ब्राह्मणोंको सहस्रों गौएँ देकर निशाचारी भूतोंको भी बलि भेंट की ।। ८ १/२ ।।
धूपगन्धनिरुद्धं तत् सुमनोभिश्च संवृतम् ।। ९ ।।
शुशुभे स्थानमत्यर्थं देवदेवस्य पार्थिव ।
पृथ्वीनाथ! देवाधिदेव महादेवजीका वह स्थान धूपोंकी सुगन्धसे व्याप्त और फूलोंसे अलंकृत होनेके कारण बड़ी शोभा पा रहा था ।। ९ १/२ ।।
कृत्वा पूजां तु रुद्रस्य गणानां चैव सर्वशः ।। १० ।।
ययौ व्यासं पुरस्कृत्य नृपो रत्ननिधिं प्रति ।
भगवान् शिव और उनके पार्षदोंकी सब प्रकारसे पूजा करके महर्षि व्यासको आगे किये राजा युधिष्ठिर उस स्थानको गये, जहाँ वह रत्न एवं सुवर्णकी राशि संचित थी ।। १० १/२ ।।
पूजयित्वा धनाध्यक्षं प्रणिपत्याभिवाद्य च ।। ११ ।।
सुमनोभिर्विचित्राभिरपूपैः कृसरेण च ।
शङ्खादींश्च निधीन् सर्वान् निधिपालांश्च सर्वशः ।। १२ ।।
अर्चयित्वा द्विजाग्र्यान् स स्वस्ति वाच्य च वीर्यवान् ।
तेषां पुण्याहघोषेण तेजसा समवस्थितः ।। १३ ।।
प्रीतिमान् स कुरुश्रेष्ठः खानयामास तद् धनम् ।
वहाँ उन्होंने नाना प्रकारके विचित्र फूल, मालपूआ तथा खिचड़ी आदिके द्वारा धनपति कुबेरकी पूजा करके उन्हें प्रणाम—अभिवादन किया। तत्पश्चात् उन्हीं सामग्रियोंसे शंख आदि निधियों तथा समस्त निधिपालोंका पूजन करके श्रेष्ठ ब्राह्मणोंकी पूजा की। फिर उनसे स्वस्तिवाचन कराकर उन ब्राह्मणोंके पुण्याहघोषसे तेजस्वी हुए शक्तिशाली कुरुश्रेष्ठ राजा युधिष्ठिर बड़ी प्रसन्नताके साथ उस धनको खुदवाने लगे ।। ११—१३ १/२ ।।
ततः पात्रीः सकरका बहुरूपा मनोरमाः ।। १४ ।।
भृङ्गाराणि कटाहानि कलशान् वर्धमानकान् ।
बहूनि च विचित्राणि भाजनानि सहस्रशः ।। १५ ।।
कुछ ही देरमें अनेक प्रकारके विचित्र, मनोरम एवं बहुसंख्यक सहस्रों सुवर्णमय पात्र निकल आये। कठौते, सुराही, गडुआ, कड़ाह, कलश तथा कटोरे—सभी तरहके बर्तन