महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व
Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva
by महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास
Page 2069 of 2566
Read in contextजमदग्नि बोले— क्रोध! मैंने तुम्हें प्रत्यक्ष देखा है। तुम निश्चिन्त होकर यहाँसे जाओ। तुमने मेरा कोई अपराध नहीं किया है; अतः आज तुमपर मेरा रोष नहीं है॥ ४७॥
यान् समुद्दिश्य संकल्पः पयसोऽस्य कृतो मया।
पितरस्ते महाभागास्तेभ्यो बुद्ध्यस्व गम्यताम् ॥ ४८ ॥
मैंने जिन पितरोंके उद्देश्यसे इस दूधका संकल्प किया था, वे महाभाग पितर ही उसके स्वामी हैं। जाओ, उन्हींसे इस विषयमें समझो॥ ४८॥
इत्युक्तो जातसंत्रासस्तत्रैवान्तरधीयत।
पितॄणामभिशङ्गाच्च नकुलत्वमुपागतः ॥ ४९ ॥
मुनिके ऐसा कहनेपर क्रोधरूपधारी धर्म भयभीत हो वहाँसे अदृश्य हो गये और पितरोंके शापसे उन्हें नेवला होना पड़ा॥ ४९॥
स तान् प्रसादयामास शापस्यान्तो भवेदिति।
तैश्चाप्युक्तः क्षिपन् धर्मं शापस्यान्तमवाप्स्यसि ॥ ५० ॥
इस शापका अन्त होनेके उद्देश्यसे उन्होंने पितरोंको प्रसन्न किया। तब पितरोंने कहा—‘तुम धर्मराज युधिष्ठिरपर आक्षेप करके इस शापसे छुटकारा पा जाओगे’॥ ५०॥
तैश्चोक्तो यज्ञियान् देशान् धर्मारण्यं तथैव च।
जुगुप्समानो धावन् स तं यज्ञं समुपासदत् ॥ ५१ ॥
उन्होंने ही उस नेवलेको यज्ञसम्बन्धी स्थान और धर्मारण्यका पता बताया था। वह धर्मराजकी निन्दाके उद्देश्यसे दौड़ता हुआ उस यज्ञमें जा पहुँचा था॥ ५१॥
धर्मपुत्रमथाक्षिप्य सक्तुप्रस्थेन तेन सः।
मुक्तः शापात् ततः क्रोधो धर्मो ह्यासीद् युधिष्ठिरः ॥ ५२ ॥
धर्मपुत्र युधिष्ठिरपर आक्षेप करते हुए सेरभर सत्तूके दानका माहात्म्य बताकर क्रोधरूपधारी धर्म शापसे मुक्त हो गया और वह धर्मराज युधिष्ठिरमें स्थित हो गया॥ ५२॥
एवमेतत् तदा वृत्ते यज्ञे तस्य महात्मनः।
पश्यतां चापि नस्तत्र नकुलोऽन्तर्हितस्तदा ॥ ५३ ॥
इस प्रकार महात्मा युधिष्ठिरका यज्ञ समाप्त होनेपर यह घटना घटी थी और वह नेवला हमलोगोंके देखते-देखते वहाँसे गायब हो गया था॥ ५३॥
१. खाद्य पदार्थको पत्थरपर फोड़कर खानेवाले। २. सूर्यकी किरणोंका पान करनेवाले। ३. पूछकर दिये हुए अन्नको ही लेनेवाले। ४. यज्ञशिष्ट अन्नको ही भोजन करनेवाले। ५. तत्त्वका विचार करनेवाले।
* संचित अन्नका व्यय किये बिना ही उसके स्पर्शमात्रसे देवताओंको तृप्त करनेकी जो भावना है, उसका नाम स्पर्शयज्ञ है।