महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व
Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva
by महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास
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Read in contextतस्माद्धि त्वां प्रपन्नस्य त्वद्भक्तस्य च केशव ।
युष्मदीयान् वरान् धर्मान् पुण्यान् कथय मेऽच्युत ।।
इसलिये केशव! अच्युत! आपकी शरणमें आये हुए मुझ भक्तसे आप अपने पवित्र एवं श्रेष्ठ धर्मोंका वर्णन कीजिये ।।
वैशम्पायन उवाच
एवं पृष्टस्तु धर्मज्ञो धर्मपुत्रेण केशवः ।
उवाच धर्मान् सूक्ष्मार्थान् धर्मपुत्रस्य हर्षितः ।।
वैशम्पायनजी कहते हैं— राजन्! धर्मपुत्र युधिष्ठिरके इस प्रकार प्रश्न करनेपर सम्पूर्ण धर्मोंको जाननेवाले भगवान् श्रीकृष्ण अत्यन्त प्रसन्न होकर उनसे धर्मके सूक्ष्म विषयोंका वर्णन करने लगे— ।।
एवं ते यस्य कौन्तेय यत्नो धर्मेषु सुव्रत ।
तस्य ते दुर्लभो लोके न कश्चिदपि विद्यते ।।
‘उत्तम व्रतका पालन करनेवाले कुन्तीनन्दन! तुम धर्मके लिये इतना उद्योग करते हो, इसलिये तुम्हें संसारमें कोई वस्तु दुर्लभ नहीं है ।।
धर्मःश्रुतो वा दृष्टो वा कथितो वा कृतोऽपि वा ।
अनुमोदितो वा राजेन्द्र नयतीन्द्रपदं नरम् ।।
‘राजेन्द्र! सुना हुआ, देखा हुआ, कहा हुआ, पालन किया हुआ और अनुमोदन किया हुआ धर्म मनुष्यको इन्द्रपदपर पहुँचा देता है ।।
धर्मः पिता च माता च धर्मो नाथः सुहृत् तथा ।
धर्मो भ्राता सखा चैव धर्मः स्वामी परंतप ।।
‘परंतप! धर्म ही जीवका माता-पिता, रक्षक, सुहृद्, भ्राता, सखा और स्वामी है ।।
धर्मादर्थश्च कामश्च धर्माद् भोगाः सुखानि च ।
धर्मादैश्वर्यमेवाग्र्यं धर्मात् स्वर्गगतिः परा ।।
‘अर्थ, काम, भोग, सुख, उत्तम ऐश्वर्य और सर्वोत्तम स्वर्गकी प्राप्ति भी धर्मसे ही होती है ।।
धर्मोऽयं सेवितः शुद्धस्त्रायते महतो भयात् ।
धर्माद् द्विजत्वं देवत्वं धर्मः पावयते नरम् ।।
‘यदि इस विशुद्ध धर्मका सेवन किया जाय तो वह महान् भयसे रक्षा करता है। धर्मसे ही मनुष्यको ब्राह्मणत्व और देवत्वकी प्राप्ति होती है। धर्म ही मनुष्यको पवित्र करता है ।।
यदा च क्षीयते पापं कालेन पुरुषस्य तु ।
तदा संजायते बुद्धिर्धर्मं कर्तुं युधिष्ठिर ।।