महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व
Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva
by महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास
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Read in contextकरनेके बाद ही अन्न ग्रहण करते हैं, शूद्रका अन्न नहीं खाते हैं, दम्भ और मिथ्याभाषणसे दूर रहते हैं, अपनी ही स्त्रीसे प्रेम रखते हैं तथा पञ्चयज्ञ और अग्निहोत्र करते रहते हैं, जिनके सब पापोंको हवन की जानेवाली तीनों अग्नियाँ भस्म कर देती हैं, वे ब्राह्मण पापरहित होकर ब्रह्मलोकको प्राप्त होते हैं ॥ क्षत्रियोऽपि स्थितो राज्ये स्वधर्मपरिपालकः । सम्यक् प्रजापालयिता षड्भागनिरतः सदा ॥ यज्ञदानरतो धीरः स्वदारनिरतः सदा । शास्त्रानुसारी तत्त्वज्ञः प्रजाकार्यपरायणः ॥ विप्रेभ्यः कामदो नित्यं भृत्यानां भरणे रतः । सत्यसन्धः शुचिर्नित्यं लोभदम्भविवर्जितः । क्षत्रियोऽप्युत्तमां याति गतिं देवनिषेविताम् ॥ क्षत्रियमें भी जो राज्यसिंहासनपर आसीन होनेके बाद अपने धर्मका पालन और प्रजाकी भलीभाँति रक्षा करता है, लगानके रूपमें प्रजाकी आमदनीका छठा भाग लेकर सदा उतनेसे ही संतोष करता है, यज्ञ और दान करता रहता है, धैर्य रखता है, अपनी स्त्रीसे संतुष्ट रहता है, शास्त्रके अनुसार चलता है, तत्त्वको जानता है और प्रजाकी भलाईके कार्यमें संलग्न रहता है तथा ब्राह्मणोंकी इच्छा पूर्ण करता है, पोष्यवर्गके पालनमें तत्पर रहता है, प्रतिज्ञाको सत्य करके दिखाता है, सदा पवित्र रहता है एवं लोभ और दम्भको त्याग देता है, उस क्षत्रियको भी देवताओंद्वारा सेवित उत्तम गतिकी प्राप्ति होती है ॥ कृषिगोपालनिरतो धर्मान्वेषणतत्परः । दानधर्मेऽपि निरतो विप्रशुश्रूषकस्तथा । सत्यसंधः शुचिर्नित्यं लोभदम्भविवर्जितः । ऋजुः स्वदारनिरतो हिंसाद्रोहविवर्जितः ॥ वणिग्धर्मान्न मुञ्चन् वै देवब्राह्मणपूजकः । वैश्यः स्वर्गतिमाप्नोति पूज्यमानोऽप्सरोगणैः ॥ जो वैश्य कृषि और गोपालनमें लगा रहता है, धर्मका अनुसंधान किया करता है, दान, धर्म और ब्राह्मणोंकी सेवामें संलग्न रहता है तथा सत्यप्रतिज्ञ, नित्य पवित्र, लोभ और दम्भसे रहित, सरल, अपनी ही स्त्रीसे प्रेम रखनेवाला और हिंसा-द्रोहसे दूर रहनेवाला है, जो कभी भी वैश्यधर्मका त्याग नहीं करता और देवता तथा ब्राह्मणोंकी पूजामें लगा रहता है, वह अप्सराओंसे सम्मानित होकर स्वर्गलोकमें गमन करता है ॥ त्रयाणामपि वर्णानां शुश्रूषानिरतः सदा । विशेषतस्तु विप्राणां दासवद् यस्तु तिष्ठति ॥ अयाचितप्रदाता च सत्यशौचसमन्वितः । गुरुदेवार्चनरतः परदारविवर्जितः ॥