महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व
Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva
by महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास
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Read in contextतानागतानभिप्रेक्ष्य समस्तं च सुहृज्जनम् । ब्राह्मणांश्च महीपाल नानादेशसमागतान् ॥ १४ ॥ उवाच मतिमान् राजा धृतराष्ट्रोऽम्बिकासुतः । भूपाल जनमेजय! राजाने देखा कि समस्त पुरवासी और जनपदके लोग वहाँ आ गये हैं। सम्पूर्ण सुहृद्-वर्गके लोग भी उपस्थित हैं और नाना देशोंके ब्राह्मण भी पधारे हैं। तब बुद्धिमान् अम्बिकानन्दन राजा धृतराष्ट्रने उन सबको लक्ष्य करके कहा— ॥ १३-१४ १/२ ॥
भवन्तः कुरवश्चैव चिरकालं सहोषिताः ॥ १५ ॥ परस्परस्य सुहृदः परस्परहिते रताः । ‘सज्जनो! आप और कौरव चिरकालसे एक साथ रहते आये हैं। आप दोनों एक-दूसरेके सुहृद् हैं और दोनों सदा एक-दूसरेके हितमें तत्पर रहते हैं ॥ १५ १/२ ॥
यदिदानीमहं ब्रूयामस्मिन् काले उपस्थिते ॥ १६ ॥ तथा भवद्भिः कर्तव्यमविचार्य वचो मम । ‘इस समय मैं आपलोगोंसे वर्तमान अवसरपर जो कुछ कहूँ, मेरी उस बातको आपलोग बिना विचारे स्वीकार करें; यही मेरी प्रार्थना है ॥ १६ १/२ ॥
अरण्यगमने बुद्धिर्गान्धारीसहितस्य मे ॥ १७ ॥ व्यासस्यानुमते राजंस्तथा कुन्तीसुतस्य मे । ‘मैंने गान्धारीके साथ वनमें जानेका निश्चय किया है; इसके लिये मुझे महर्षि व्यास तथा कुन्तीनन्दन राजा युधिष्ठिरकी भी अनुमति मिल गयी है ॥ १७ १/२ ॥
भवन्तोऽप्यनुजानन्तु मा च वोऽभूद् विचारणा ॥ १८ ॥ अस्माकं भवतां चैव येयं प्रीतिर्हि शाश्वती । न च सान्येषु देशेषु राज्ञामिति मतिर्मम ॥ १९ ॥ ‘अब आपलोग भी मुझे वनमें जानेकी आज्ञा दें। इस विषयमें आपके मनमें कोई अन्यथा विचार नहीं होना चाहिये। आपलोगोंका हमारे साथ जो यह प्रेम-सम्बन्ध सदासे चला आ रहा है, ऐसा सम्बन्ध दूसरे देशके राजाओंके साथ वहाँकी प्रजाका नहीं होगा, ऐसा मेरा विश्वास है ॥ १८-१९ ॥
शान्तोऽस्मि वयसानेन तथा पुत्रविनाकृतः । उपवासकृशश्चास्मि गान्धारीसहितोऽनघाः ॥ २० ॥ ‘निष्पाप प्रजाजन! अब इस बुढ़ापेने गरधारीसहित मुझको बहुत थका दिया है। पुत्रोंके मारे जानेका दुःख भी बना ही रहता है तथा उपवास करनेके कारण भी हम दोनों अधिक दुर्बल हो गये हैं ॥ २० ॥
युधिष्ठिरगते राज्ये प्राप्तश्चास्मि सुखं महत् । मन्ये दुर्योधनैश्वर्याद् विशिष्टमिति सत्तमाः ॥ २१ ॥