महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व
Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva
by महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास
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Read in contextवसूरत्नसमाकीर्णां ददावांगिरसे तदा ॥ ९३ ॥
भीष्मजी कहते हैं— राजन्! बृहस्पतिजीके मुँहसे भूमिदानका यह माहात्म्य सुनकर इन्द्रने धन और रत्नोंसे भरी हुई यह पृथ्वी उन्हें दान कर दी ॥ ९३ ॥
य इदं श्रावयेच्छ्राद्धे भूमिदानस्य सम्भवम् ।
न तस्य रक्षसां भागो नासुराणां भवत्युत ॥ ९४ ॥
जो पुरुष श्राद्धके समय पृथ्वीदानके इस माहात्म्यको सुनता है, उसके श्राद्धकर्ममें अर्पण किये हुए भाग राक्षस और असुर नहीं लेने पाते ॥ ९४ ॥
अक्षयं च भवेद् दत्तं पितृभ्यस्तन्न संशयः ।
तस्माच्छाद्धेष्विदं विद्वान् भुञ्जतः श्रावयेद् द्विजान् ॥ ९५ ॥
पितरोंके निमित्त उसका दिया हुआ सारा दान अक्षय होता है, इसमें संशय नहीं है; इसलिये विद्वान् पुरुषको चाहिये कि वह श्राद्धमें भोजन करते हुए ब्राह्मणोंको यह भूमिदानका माहात्म्य अवश्य सुनाये ॥ ९५ ॥
इत्येतत् सर्वदानानां श्रेष्ठमुक्तं तवानघ ।
मया भरतशार्दूल किं भूयः श्रोतुमिच्छसि ॥ ९६ ॥
निष्पाप भरतश्रेष्ठ! इस प्रकार मैंने सब दानोंमें श्रेष्ठ पृथ्वीदानका माहात्म्य तुम्हें बताया है, अब और क्या सुनना चाहते हो? ॥ ९६ ॥
इति श्रीमहाभारते अनुशासनपर्वणि दानधर्मपर्वणि इन्द्रबृहस्पतिसंवादे
द्विषष्टितमोऽध्यायः ॥ ६२ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत अनुशासनपर्वके अन्तर्गत दानधर्मपर्वमें इन्द्र और बृहस्पतिका
संवादविषयक बासठवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ६२ ॥
(दाक्षिणात्य अधिक पाठके २ १/३ श्लोक मिलाकर कुल ९८ १/३ श्लोक हैं)