महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व
Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva
by महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास
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Read in contextतथा सर्वं कृतवान् धर्मराजो भीष्मेणोक्तो विधिवद् गोप्रदाने । स मान्धातुर्देवदेवोपदिष्टं सम्यग्धर्मं धारयामास राजा ॥ २९ ॥ **वैशम्पायनजी कहते हैं—**जनमेजय! भीष्मजीने जब इस प्रकार विधिवत् गोदान करनेकी आज्ञा दी, तब धर्मराज युधिष्ठिरने सब वैसा ही किया तथा देवताओंके भी देवता बृहस्पतिजीने मान्धाताके लिये जिस उत्तम धर्मका उपदेश किया था, उसको भी भलीभाँति स्मरण रखा ॥ २९ ॥ इति नृप सततं गवां प्रदाने यवशकलान् सह गोमयैः पिबानः । क्षितितलशयनः शिखी यतात्मा वृष इव राजवृषस्तदा बभूव ॥ ३० ॥ नरेश्वर! राजाओंमें श्रेष्ठ युधिष्ठिर उन दिनों सदा गोदानके लिये उद्यत होकर गोबरके साथ जौके कणोंका आहार करते हुए मन और इन्द्रियोंके संयमपूर्वक पृथ्वीपर शयन करने लगे। उनके सिरपर जटाएँ बढ़ गयीं और वे साक्षात् धर्मके समान देदीप्यमान होने लगे ॥ ३० ॥ नरपतिरभवत् सदैवताभ्यः प्रयतमनास्त्वभिसंस्तुवंश्च ताः स्म । न च धुरि नृप गामयुक्त भूय- स्तुरगवरैरगमच्च यत्र तत्र ॥ ३१ ॥ नरेन्द्र! राजा युधिष्ठिर सदा ही गौओंके प्रति विनीत-चित्त होकर उनकी स्तुति करते रहते थे। उन्होंने फिर कभी बैलका अपनी सवारीमें उपयोग नहीं किया। वे अच्छे-अच्छे घोड़ोंद्वारा ही इधर-उधरकी यात्रा करते थे ॥
इति श्रीमहाभारते अनुशासनपर्वणि दानधर्मपर्वणि गोदानकथने षट्सप्ततितमोऽध्यायः ॥ ७६ ॥ इस प्रकार श्रीमहाभारत अनुशासनपर्वके अन्तर्गत दानधर्मपर्वमें गोदानकथनविषयक छिहत्तरवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ७६ ॥