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मनुस्मृति (कुल्लूकभट्ट टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)

मनुस्मृति (कुल्लूकभट्ट टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)

Manusmriti with Kulluka Bhatta Tika & Hindi Translation

by महर्षि मनु

Source: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (origin)

DevanagariSanskritpublished649 pages

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· ६८ मनुस्मृति । शिवपूजन में उपयोग करते हैं, विष्णुचरणामृत तथा एकादशी- जन्माष्टमीव्रत से पराङ्मुख नहीं हैं, इस दशा में पूर्वापर विचार से यही ज्ञात होता है कि जब श्रीशठकोप आदि शूद्राचार्य के संप्रदाय में श्रीरामानुज आदि ब्राह्मण व्यक्ति दैववशात् प्रवृत्त हुए और ये लोग अपने ब्राह्मणसमाज में शूद्राचार्यक होने के कारण हीनदृष्टि से व्यवहृत हुए तब कुपित होकर इन लोगों ने अपने संप्रदाय के प्रतिष्ठार्थ अनेक ग्रन्थ और वाक्य बनाये तथा श्रुति-स्मृति को गौरवार्थ ढाल बनाया । जो अन्य वैष्णव भी इनके आचार से सहमत हुए वे भी इन लोगों की तरह शैवद्वेषी हुए । बाक़ी संप्रदायी वैष्णव भी शैवद्वेषी न हुए । जैसे वल्लभ-संप्रदायी वैष्णव लोग.... । 'परमेश्वरैक्य' प्रकरण में पञ्च देवताओं का ऐक्य अनेक प्रकार से सिद्ध होचुका है । अब विष्णु और शिव के कति- पय घनिष्ठ संबन्धों को दिखलाते हैं-जब शिव, विष्णुपदी (गङ्गा) को धारण करते हैं और विष्णु, शिवकृपा से प्राप्त चक्र (सुदर्शन) को धारण करते हैं तथा विष्णु-शिव मिल- कर हरिहर (हरिहरावतार) बने; तब उपास्यों के ऐसे हिलमिल बर्ताव में उपासकों का अनमिल बर्ताव क्यों ? और १ 'गाङ्गं वारि मनोहारि मुरारिचरणच्युतम् । त्रिपुरारिशिरश्चारि पापहारि पुनातु माम् ॥' २ 'हरिस्ते साहस्त्रं कमलवलिमाधाय पदयोर्यदेकोने तस्मिन्निजमुदहरन्नेत्रकमलम् । गतोभक्त्युद्रेकः परिणतिमसौ चक्रवपुषा त्रयाणां रक्षायै त्रिपुरहर जागर्त्ति जगताम् ॥' ३ अर्धे दानववैरिणा गिरिजयाप्यर्धे शिवस्याहृतं देवेत्थं जगतीतले स्मरहराभावे समुन्मीलति । गङ्गासागरमम्बरं शशिकला नागाधिपः क्ष्मातलं सर्वज्ञत्वमधीश्वरत्वमगमत्त्वां मां च भिक्षाटनम् ॥'