मनुस्मृति (कुल्लूकभट्ट टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)
Manusmriti with Kulluka Bhatta Tika & Hindi Translation
by महर्षि मनु
Source: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (origin)
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Read in contextभूमिका।
विष्णु में समन्वित किये गये हैं पर इन वाक्यों की सुप्रसिद्ध वर्णाश्रम व्यवस्थापक ग्रन्थों के साथ एकवाक्यता होनी असंभव है।
मन्वादि-शास्त्रानुसार कल्प ( ब्रह्मदिन ) कृत, त्रेता, द्वापर, कलि तथा मन्वन्तरसंज्ञक कालविभाग से विभक्त माना गया है; और कृतादि विभाग के अनुसार ही धर्म, ज्ञान, वैराग्य, ऐश्वर्यात्मक सात्त्विक भाव पादक्रम से न्यून कहागया है; और एक गुणोपाधिक कार्य ब्रह्म की उपासना कहीं नहीं है, किन्तु सर्वगुणोपाधिक कारण ब्रह्मही की उपासना सर्वत्र कही है; अत एव उनके सर्वगुणमय चरित्र इतिहास-पुराणों में जगमगा रहे हैं; और एककर्तृक लोकव्यवस्था मानने में एकत्रही राजस, सात्त्विक, तामस गुणों का उपसंहार है, वासनाभेद से वह ( अधिष्ठान ) चाहे राम-कृष्ण नाम से उपास्य हो वा विष्णु-शिव नाम से उपास्य हो; और उपास्य- प्राप्ति ( मोक्ष ) भक्ति-ज्ञान से है, भक्ति-ज्ञान की उत्पत्ति अन्तःकरण शुद्धि से कही है; ऐसी दशा में व्युत्थान काल में वर्णाश्रममर्यादा के बांधनेवाले मन्वादि तथा ज्ञाननिष्ठ कपिलादि, काल्पनिक सात्त्विक-राजस-तामस कल्प ( कोटि ) से क्यों घसीटे जाते हैं ? और यह खैंचातानी भगवान् वेद- पुरुष तक क्या नहीं पहुँची ? अवश्य पहुँच कर उनको ढीला करदिया ।
काल की दशा-
‘ भिन्ना व्याकृतिदण्डनेन शतधा वेदोऽर्थतः पाठ्यते तत्पोष्याः स्मृतयोऽवसन्नमनसोऽङ्गाङ्गात्समुद्धाम्यता'