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मनुस्मृति (कुल्लूकभट्ट टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)

मनुस्मृति (कुल्लूकभट्ट टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)

Manusmriti with Kulluka Bhatta Tika & Hindi Translation

by महर्षि मनु

Source: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (origin)

DevanagariSanskritpublished649 pages

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Page 106

१०४ मनुस्मृति । कोई सा जितेन्द्रिय महापुरुष मोक्ष की वासना से शास्त्रद्वारा आत्मा का प्रत्यक्ष करता है । ‘चक्षुषा गृह्यते नापि वाचा नान्यैर्देवैस्तपसा कर्मणा वा । ज्ञानप्रसादेन विशुद्धसत्त्व- स्ततस्तु तं पश्यते निष्कलं ध्यायमानः ॥’ मुण्डक. ‘यं विनिद्रा जितश्वासाः संतुष्टाः संयतेन्द्रियाः । ज्योतिः पश्यन्ति युञ्जानास्तस्मै योगात्मने नमः ॥’ स्मृति. और यही आशय ‘अपि संराधने प्रत्यक्षाऽनुमानाभ्याम्’ (वे०द० ३।२।२४) इस सूत्र का है तथा इस कल्पतरु के श्लोक का है— ‘अपि संराधने सूत्राच्छास्त्रार्थध्यानजाप्रमा । शास्त्रदृष्टिर्मता तां तु वेत्ति वाचस्पतिः परः ॥’ इत्यादि प्रमाणों से स्पष्ट है कि उस निर्विशेष (निराकार) परात्मा का चाक्षुष प्रत्यक्ष नहीं होता वह केवल ज्ञानगम्य है। और जो कहीं इसका प्रत्यक्ष होना लिखा है वह सब मायासृष्टि है, इसीलिये ‘माया ह्येषा मया सृष्टा यन्मां पश्यसि नारद’ यह कहा है। और यही अभिप्राय भगवद्गीता में अर्जुन ने भगवान् के दिव्यरूप को जो देखा है उसका है। कृष्ण-भगवान् के साधारण अवतारस्वरूप को तो उस समय के सबलोग देखते ही रहे। यही बात रामावतार में भी जाननी चाहिये । सविशेष और निर्विशेष इन दो विशेषणों से ब्रह्म दो प्रकार का जाना जाता है उनमें सविशेष अर्थात् नाम-रूप की