BharatKosha
मनुस्मृति (कुल्लूकभट्ट टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)

मनुस्मृति (कुल्लूकभट्ट टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)

Manusmriti with Kulluka Bhatta Tika & Hindi Translation

by महर्षि मनु

Source: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (origin)

DevanagariSanskritpublished649 pages

Page 110 of 649

Read in context
Page 110

१०८ मनुस्मृति।

˙ऐसी अवस्था में सविशेष पक्ष लेकर विष्णु वा शिव के ऐच्छिक एकही आकार पर अथवा ऐच्छिक आकार के उप- संहार पर निर्भर होकर ब्रह्मसूत्रों की योजना करना ऐच्छिक व्याख्या ( ब्रह्मसूत्र-भाष्य ) नहीं है तो और क्या है ? उसे क्या कहना चाहिये ? देखिये यदि किसी संहिता ब्राह्मण- भाग, वा तदाश्रित ब्रह्मसूत्र में विष्णु वा शिव का सविशेष ( आकारघटक लिङ्ग ) प्राप्त होता तो पुराणों की तरह सविशेष ( विष्णु शिव आदि ) के अभिप्राय से ब्रह्मसूत्र की व्याख्या करने में क्या दोष था ? कुछ भी नहीं । पर ऐसा न होने से भगवान् वेदव्यास ने निर्विशेष के लक्ष्य से तदनुकूल 'ब्रह्म' शब्द का प्रयोग 'अथातो ब्रह्मजिज्ञासा' इस शास्त्रारम्भ के सूत्र में किया । ऐसी दशा में सविशेष पक्ष का आलम्बन करके 'ब्रह्म' शब्द का केवल विष्णु वा केवल शिव अर्थ करना एकदेशीय-मत है। अत एव ये सब व्याख्यान एकदेशी हैं— 'ब्रह्मशब्देन च स्वभावतो निरस्तनिखिलदोषोऽनवधिकाति- शयासंख्येयकल्याणगुणगणः पुरुषोत्तमोऽभिधीयते' श्रीभाष्य। 'अनन्ताचिन्त्यस्वाभाविकस्वरूपगुणशक्त्यादिभिर्बृहत्तमो यो रमाकान्तः पुरुषोत्तमो, ब्रह्मशब्दाभिधेयः—' वेदान्तपा- रिजातसौरभ. 'ब्रह्मशब्दश्च विष्णावेव' पूर्णप्रज्ञदर्शन. तात्पर्य यह है कि 'सविशेष ब्रह्मवाद' में भी ब्रह्मशब्द केवल विष्णु का वाचक नहीं होसकता क्योंकि ब्रह्मशब्द का विष्णु में शक्तिग्रह नहीं है इसीलिये श्रुति स्मृति में ब्रह्म विष्णु शिव आदि शब्द पर्याय ( प्रयोगप्रवाह से एकार्थक ) नहीं माने गये । यदि वेदान्तप्रक्रिया से ब्रह्मशब्द का विष्णु अर्थ

मनुस्मृति (कुल्लूकभट्ट टीका व हिन्दी अनुवाद सहित) · Page 110 of 649 · BharatKosha