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मनुस्मृति (कुल्लूकभट्ट टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)

मनुस्मृति (कुल्लूकभट्ट टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)

Manusmriti with Kulluka Bhatta Tika & Hindi Translation

by महर्षि मनु

Source: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (origin)

DevanagariSanskritpublished649 pages

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११० मनुस्मृति ।

शक्तिसेनाकल्पना च ब्रह्मह्येवं हि पञ्चधा । कल्पितस्य शरीरस्य तस्य सेनादिकल्पना ॥ रामतापनी. ( कृष्ण ) ‘कृषिर्भूवाचकः शब्दो णश्च निर्वृत्तिवाचकः । तयोरैक्यं परंब्रह्म कृष्ण इत्यभिधीयते ॥’ गोपालतापनी. ‘कृष्यते विलिख्यते इति कृट्, भूमिः सर्वाधारः, निर्वृत्तिः आनन्दः सुखम्; तयोरैक्यं सामानाधिकरण्यम् । तच्च यदा कर्म- धारयेण भवति तदा परंब्रह्म कृष्णे इति शब्देनाभिधीयते । अथवा भूग्रहणं दृश्योपलक्षणम् , निर्वृत्तिः सुखस्वरूपं ब्रह्म, तयोरैक्यम् अध्यासन्निवृत्त्या शुद्धात्मतापादनम् ।’ इति नारायणः। पश्चात्ताप का विषय है कि जब शास्त्रों में अथ से इति तक यथास्थान निर्विशेष ब्रह्म का प्रतिपादन प्राप्त होता है और उसी का प्राधान्य माना है; केवल उपासनार्थ सविशेष ब्रह्म का निरूपण किया है; और निर्विशेष ब्रह्म की सिद्धि के लिये अद्वैतवाद तथा उसके उपयोगी अध्यासवाद विवर्तवाद आदि श्रुति युक्तिसिद्ध पदार्थ कल्पना किये हैं और यह अद्वैतवाद आत्मसाक्षात्कार के पश्चात् अनुभव में आता है यह बात— ‘देहात्मप्रत्ययो यद्वत्प्रमाणत्वेन कल्पितः । लौकिकं तद्वदेवेदं प्रमाणं त्वाऽऽत्मनिश्चयात् ॥’ इत्यादि श्रुति-स्मृति-युक्ति-सिद्ध प्रमाणों से स्पष्ट है और व्यवहार दशा में द्वैतवाद ही मानागया है तोभी हठात् संप्र-