मनुस्मृति (कुल्लूकभट्ट टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)
Manusmriti with Kulluka Bhatta Tika & Hindi Translation
by महर्षि मनु
Source: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (origin)
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Read in contextभूमिका। ११५ पत और पञ्चरात्र का खण्डन ब्रह्मसूत्रही में आचुका है और अनिषिद्ध पाशुपत तथा पञ्चरात्र सर्वथा ग्राह्य हैं यह विचार भी पहिले आचुका है। सांख्य और तत्समान तन्त्र-योग के प्रधान कारण वादादि कतिपय विषय का निरास ब्रह्मसूत्रही में आया है बाकी के विषय माननीय हैं, इसीलिये सांख्य-योग की महिमा सर्वत्र प्रसिद्ध है। न्याय और वैशेषिक के भी कति- पय अंश दूष्य हैं उनका भी खण्डन ब्रह्मसूत्र में लिखा है। चार्वाकादि नास्तिक दर्शन की अग्राह्यता सर्वत्र सुप्रसिद्ध है जिसका यहां प्रस्ताव ही नहीं है। बाकी रही पूर्वोत्तरमीमांसा; जिनमें पूर्वमीमांसा का निरास पद्मपुराण के ही वाक्य से प्राप्त हुआ। और उत्तरमीमांसा का नामही नहीं है; यदि 'माया- वाद' शब्द से उसका नाम ग्रहण किया जाय तो उत्तर- मीमांसा का प्रतिपाद्य मायावाद सिद्ध होगा, वह इष्ट नहीं है; यदि स्वतन्त्र ग्रन्थ माना जाय तो इस नाम का धार्मिक ग्रन्थ मिलना चाहिये; यदि मायावाद स्वतन्त्र विषय मानाजाय तो विषयी ग्रन्थों की गणना में विषयमात्र का निर्देश विरुद्ध है; यदि वक्ता के अभिप्राय से शाङ्कर-भाष्य मानलिया जावे तो भी पद्मपुराण के कथनमात्र से वह अग्राह्य कथमपि नहीं हो सकता और पूर्वमीमांसा की मान्यता के बारे में पराशर- पुराण का वाक्य लिखा जा चुका है। विचार का विषय है कि जब मायावाद, ब्रह्म जीवैक्य तथा नैर्गुण्य (निर्विशेषत्व) आदि वेदान्त के विषय अद्वैतवाद के अनुयायी हैं और अद्वैत वाद तथा मायावाद आदि, श्रुति-स्मृति-इतिहास-पुराण संस्कृत-भाषा निबन्धों में परिपूर्ण रीति से कहे हैं तब उनका अन्यान्य अभिप्राय है यह कहना वा इसके लिये प्रयत्न करना