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मनुस्मृति (कुल्लूकभट्ट टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)

मनुस्मृति (कुल्लूकभट्ट टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)

Manusmriti with Kulluka Bhatta Tika & Hindi Translation

by महर्षि मनु

Source: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (origin)

DevanagariSanskritpublished649 pages

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१२० मनुस्मृति। प्रमाण में उनके भाष्यादि साधन मौजूद हैं और जब एक आचार्य दूसरे के मत का खण्डन करके अपने मन्तव्य को स्थिर करते हैं तब स्पष्ट है कि उनका परस्पर में मतभेद है ऐसी दशा में कौन मत सर्वोत्तम माना जावे ? इनसे अति- रिक्त श्रीचैतन्यमहाप्रभु श्रीस्वामिनारायण आदिके मत हैं जो अब सज्जित होरहे हैं । प्रासङ्गिक श्लोक याद आता है- ‘ एकस्यैव महेश्वरस्य निगमे कृष्णादिरूपश्रुतौ सिद्धायामपि भेदवादनिपुणाः स्वस्वार्थनिष्पत्तये । वेदान्तान् परिवर्त्य शास्त्रवचनान्युन्मथ्य नानाशयै- र्भेदान् वैष्णवमण्डलेऽप्यजनयन्शैवादिवार्तैव का ॥’ किं बहुना, उपास्य ( ध्येयाकार ) भेद, मन्त्रभेद, तिलक भेद, अङ्कनभेद, मालाभेद, एकादशी आदि व्रतभेद, आचारभेद ने वर्णाश्रमशृङ्खला को शिथिल करदिया, शिथिल तो कलि ने किया पर ये सब भी निमित्त कारण हुए और बहुधा आकार के भेद न होने पर भी शैवापसदों से भी वर्णाश्रमाचार को धक्का ही पहुँचा । इधर दुराग्रही वैष्णवों का १ आप का अवतार बङ्गाल में हुआ है । २ आपकी जन्मभूमि अयोध्यामण्डल और विकासभूमि गुर्जरमण्डल है । ३ अरुणोदयवेध, प्राक्कापालिकवेध । एकादशी सर्वमान्य व्रत है पर इसका अत्याचार दो देशों में अधिक देखा जाता है । एक वङ्ग में, जहां अदीक्षित बाल- विधवा भी एकादशी के घोर नियमों से मृतप्राय करडाली जाती हैं । धन्य हैं वङ्गपण्डित महाशय । दूसरे अयोध्याप्रान्त में किती किसी स्थान पर एकादशी के दिन हाथी घोड़े दाना नहीं पाते । ४ अपने अपने मतानुसार दीक्षा पाये हुए शूद्रों के स्पृष्ट पक्वान्न तक के ग्रहण में परहेज न होगा परंतु अदीक्षित वैदिक ब्राह्मण के स्पर्श किये हुए जल का भी ग्रहण न किया जायगा ......।