BharatKosha
मनुस्मृति (कुल्लूकभट्ट टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)

मनुस्मृति (कुल्लूकभट्ट टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)

Manusmriti with Kulluka Bhatta Tika & Hindi Translation

by महर्षि मनु

Source: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (origin)

DevanagariSanskritpublished649 pages

Page 128 of 649

Read in context
Page 128

मनुस्मृति में क्षेपक की आशङ्का— 'मनुस्मृति' अत्यन्त प्राचीन स्मृतिशास्त्र है । जिसके श्लोक वाल्मीकीय-रामायण में भी प्राप्त हैं (देखिये भूमिका पृष्ठ १२४ ) -और- अन्यान्य स्मृतिग्रन्थों में भी मिलते हैं (देखिये भू० १२३) और धर्माब्धिसार-स्मृतिचन्द्रिका-हेमाद्रि- पराशरमाधव-स्मृतिरत्नाकर-मिताक्षरा-निर्णयसिन्धु-संस्कार- कौस्तुभ आदि ग्रन्थों में 'मनु' के नाम से जो कतिपय श्लोक लिखे हैं वे मनुस्मृति में नहीं उपलब्ध होते हैं देखिये मण्ड- लीक संगृहीत (मनुस्मृति परिशिष्ट) उसका कारण उक्तप्राय है (देखिये भू० १२३) इस दशा में विप्रकीर्ण मानववाक्य विरोधी होनेपर चिन्तनीय हैं, न कि सहसा उनकी अप्रमा- णिकता सिद्ध होसकती है यह 'मनुस्मृति' (इसकी श्लोक- संख्या विषय संकलन में स्पष्ट है) अत्यन्त प्रामाणिक है, इसमें क्षेपक का गन्धमात्र नहीं है इसके ऊपर अनेक टीकायें हुई हैं जिनमें मेधातिथि, सर्वज्ञनारायण, गोविन्दराज, कुल्लूक, राघवानन्द, नन्दन और रामचन्द्र की बनाई टीकायें सुप्रसिद्ध हैं । इस दशा में भी इस 'मनुस्मृति' में वही लोग क्षेपक कह सकते हैं जो वैदिकरहस्य नहीं जानते हैं, अथवा जो कोई