मनुस्मृति (कुल्लूकभट्ट टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)
Manusmriti with Kulluka Bhatta Tika & Hindi Translation
by महर्षि मनु
Source: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (origin)
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Read in contextपहला अध्याय। ५ सर्वेषान्तु स नामानि कर्माणि च पृथक् पृथक् । वेदशब्देभ्य एवादौ पृथक्संस्थाश्च निर्ममे ॥ २१ ॥ पञ्चमहाभूत और मन अपने कार्यों और सूक्ष्म अवयवों के द्वारा सब भूतों की उत्पत्ति के लिये अविनाशी ब्रह्म में प्रविष्ट होते हैं। उन सात प्रकृतियों अर्थात् महत्तत्त्व, अहङ्कार और पञ्चमहाभूत की सूक्ष्म मात्राओं से पञ्चतन्मात्रा से अविनाशी परमात्मा नाशवान् जगत् को उत्पन्न किया करता है। इन पञ्चमहाभूतों में पहले पहले का गुण दूसरा दूसरा पाता है। जैसा, आकाश का गुण शब्द आगे के वायु में व्याप्त हुआ। वायु का गुण स्पर्श अग्नि में, अग्नि का रूप जल में इत्यादि। इनमें जिसमें जितने गुण हैं वह उतने गुणोंवाला है। जैसे आकाश में एक गुण शब्द है। वायु में शब्द और स्पर्श दो गुण हैं इसलिये आकाश एक गुणवाला और वायु दो गुणवाला कहलाया। यों आगे भी जानना चाहिए। परमात्मा ने वेदानुसार ही सबके नाम और कर्म अलग अलग बांट दिये हैं, जैसा गोजाति का नाम गो, अश्व का अश्व और कर्म जैसा ब्राह्मणों का वेदाध्ययन आदि, क्षत्रियों का प्रजारक्षा आदि जैसा पूर्वकल्प में था * वैसा ही रचा गया है ॥ १८-२१ ॥ कर्मात्मनां च देवानां सोऽसृजत्प्राणिनां प्रभुः । साध्यानाञ्च गणं सूक्ष्मं यज्ञं चैव सनातनम् ॥ २२ ॥ अग्निवायुरविभ्यस्तु त्रयं ब्रह्म सनातनम् । दुदोह यज्ञसिद्ध्यर्थमृग्यजुःसामलक्षणम् ॥ २३ ॥ कालङ्कालविभक्तीश्च नक्षत्राणिग्रहांस्त था । सरितः सागरान् शैलान् समानि विषमाणि च ॥ २४ ॥ फिर परमात्मा ने, यज्ञादि में जिनको भाग दिया जाता है, ऐसे प्राणवाले इन्द्रादि देवता; वनस्पति आदि के स्वामी देवता, साध्य-
- वेद में लिखा है-'धाता यथापूर्वमकल्पयत् ... ।'