मनुस्मृति (कुल्लूकभट्ट टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)
Manusmriti with Kulluka Bhatta Tika & Hindi Translation
by महर्षि मनु
Source: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (origin)
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Read in context१४ मनुस्मृति । का, पितरों का एक अहोरात्र होता है । उसमें कृष्णपक्ष का दिन कर्म करने और शुक्लपक्ष की रात्रि शयन करने के लिएहै ॥ ६३-६६ ॥ दैवे राज्यहनी वर्ष प्रविभागस्तयोः पुनः । अहस्तत्रोदगयनं रात्रिः स्याद्दक्षिणायनम् ॥ ६७ ॥ ब्राह्मस्य तु क्षयाहस्य यत्प्रमाणं समासतः । एकैकशो युगानां तु क्रमशस्तन्निबोधत ॥ ६८ ॥ चत्वार्याहुः सहस्राणि वर्षाणां तु कृतं युगम् । तस्य तावच्छती सन्ध्या सन्ध्यांशश्च तथाविधः ॥ ६६ ॥ इतरेषु ससंख्येषु ससंध्यांशेषुच त्रिषु । एकापायेन वर्तन्ते सहस्राणि शतानि च ॥ ७० ॥ यदेतत्परिसंख्यातमादावेव चतुर्युगम् । एतद्द्वादशसाहस्रं देवानां युगमुच्यते ॥ ७१ ॥ दैविकानां युगानान्तु सहस्रं परिसंख्यया । ब्राह्ममेकमहर्ज्ञेयं तावतीं रात्रिमेव च ॥ ७२ ॥ मनुष्यों के एक वर्ष में देवताओं का अहोरात्र होता है । उस में उत्तरायण दिन और दक्षिणायन रात है । ब्राह्म अहोरात्र और चारों युगों का प्रमाण इस प्रकार है-मनुष्यों के ३६० वर्ष का १ देव- वर्ष होता है । ऐसे चार हजार वर्षों को कृतयुग कहते हैं और उसकी संध्या (युग का आरम्भकाल) और सन्ध्यांश (युग का अन्तकाल) दोनों चारसौ ४०० वर्ष का है । यों सन्ध्या और सन्ध्यांश मिलकर ४८०० दैववर्ष का कृतयुग होता है । अर्थात् ४८०० × ३६० = १७२८००० वर्ष उसका मान है । बाकी त्रेता, द्वापर और कलि इन तीनों के सन्ध्या और सन्ध्यांश के साथ जो संख्या होती है, उस में हजार में की और सैकड़े में की एक एक संख्या घटाने से तीनों की संख्या पूरी होती है । इस प्रकार, त्रेतायुग ३६००=१२९६००० । द्वापर = २४०० = ८६४०००