मनुस्मृति (कुल्लूकभट्ट टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)
Manusmriti with Kulluka Bhatta Tika & Hindi Translation
by महर्षि मनु
Source: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (origin)
Page 158 of 649
Read in context१८ .मनुस्मृति । नियत किये। पढ़ना, पढ़ाना, यज्ञ करना, यज्ञ कराना, दान देना, दान लेना, ये छः कर्म ब्राह्मणों के हैं। प्रजा की रक्षा करना, दान देना, यज्ञ करना, पढ़ना और इन्द्रियों के विषयों में न फँसना, ये क्षत्रियों के कर्म हैं। पशुओं को पालना, दान देना, यज्ञ करना, पढ़ना, व्यापार करना, व्याज लेना और खेती करना, ये सब काम वैश्य के हैं। परमात्माने शूद्रों का एक ही काम बतलाया है-ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य की भक्ति से, सेवा करना ॥ ८८-९१ ॥ ऊर्ध्वं नाभेर्मेध्यतरः पुरुषः परिकीर्तितः । तस्मान्मेध्यतमं तस्य मुखमुक्तं स्वयम्भुवा ॥ ९२ ॥ उत्तमाङ्गोद्भवाज्ज्यैष्ठ्याद्ब्राह्मण्याश्चैव धारणात् । सर्वस्यैवास्य सर्गस्य धर्मतो ब्राह्मणः प्रभुः ॥ ९३ ॥ पुरुष नाभि के ऊपर अतिपुनीत माना गया है । उससे भी उस का मुख अतिपवित्र है । परमात्मा के मुखतुल्य होने से, चारों वर्णों में बड़ा होने से, और वेद पढ़ाने से, ब्राह्मण सारे जगत् का प्रभु है ॥ ९२-९३ ॥ तं हि स्वयम्भूः स्वादास्यात्तपस्तप्त्वादितोऽसृजत् । हव्यकव्याभिवाह्याय सर्वस्यास्य च गुप्तये ॥ ९४ ॥ यस्यास्येन सदाश्नन्ति हव्यानि त्रिदिवौकसः । कव्यानि चैव पितरः किम्भूतमधिकं ततः ॥ ९५ ॥ भूतानां प्राणिनः श्रेष्ठाः प्राणिनां बुद्धिजीविनः । बुद्धिमत्सु नराः श्रेष्ठा नरेषु ब्राह्मणाः स्मृताः ॥ ९६ ॥ ब्राह्मणेषु च विद्वांसो विद्वत्सु कृतबुद्धयः । कृतबुद्धिषु कर्त्तारः कर्तृषु ब्रह्मवेदिनः ॥ ९७ ॥ उत्पत्तिरेव विप्रस्य मूर्त्तिर्धर्मस्य शाश्वती । स हि धर्मार्थमुत्पन्नो ब्रह्मभूयाय कल्पते ॥ ९८ ॥