मनुस्मृति (कुल्लूकभट्ट टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)
Manusmriti with Kulluka Bhatta Tika & Hindi Translation
by महर्षि मनु
Source: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (origin)
Page 160 of 649
Read in context२० मनुस्मृति। पुनाति पङ्क्तिं वंश्यांश्च सप्त सप्त परावरान् । पृथिवीमपि चैवेमां कृत्स्नामेकोपि सोर्हति ॥ १०५ ॥ ब्राह्मण, यदि दूसरे का दिया अन्न भोजन करे, या वस्त्र पहने, या दान देवे, तौभी वह सब ब्राह्मण का अपना ही है। और लोग तो ब्राह्मणों की कृपा से भोजन पाते हैं। ब्राह्मण और क्षत्रियों के कर्म विवेक के लिये स्वायम्भुव मनु ने यह धर्मशास्त्र बनाया। वि- द्वान् ब्राह्मण को यह धर्मशास्त्र पढ़ना और शिष्यों को पढ़ाना चाहियें। और किसी को उपदेश न करना चाहिये । नियमनिष्ठ ब्राह्मण जो इस शास्त्र का अध्ययन करता है वह मन, वाणी, देह के पापों से लिप्त नहीं होता । धर्मशास्त्रविशारद, अपवित्र पंक्ति को पवित्र कर देता है और अपने वंशके सात पिता, पितामह आदि और पुत्र, पौत्र आदि को पवित्र करदेता है । और सारी पृथिवी को भी वह लेने योग्य है ॥ १०१-१०५ ॥ इदं स्वस्त्ययनं श्रेष्ठमिदं बुद्धिविवर्धनम् । इदं यशस्यमायुष्यमिदं निःश्रेयसं परम् ॥ १०६ ॥ अस्मिन् धर्मोखिलेनोक्तो गुणदोषौ च कर्मणाम् । चतुर्णामपि वर्णानामाचारश्चैव शाश्वतः ॥ १०७ ॥ आचारः परमोधर्मः श्रुत्युक्तः स्मार्त्त एव च । तस्मादस्मिन्सदायुक्तोनित्यंस्यादात्मवान्द्विजः॥१०८॥ यह शास्त्र, कल्याणदायक, बुद्धिवर्धक, यशदायक, आयुवर्धक और मोक्ष का सहायक है। इस स्मृति में सारे धर्म कर्म कहे हैं। कर्मों के गुण दोष भी कहे हैं । और चारों वर्णों का परंपरा से प्राप्त आचार कथन किया गया है। श्रुति और स्मृति में कहा आचार परमधर्म है, इस लिए इस में ब्राह्मणों को सदा तत्पर रहना चाहिए ॥ १०६-१०८ ॥ आचाराद्विच्युतो विप्रो न वेदफलमश्नुते । आचारेण तु संयुक्तः संपूर्णफलभाग्भवेत् ॥ १०६ ॥