मनुस्मृति (कुल्लूकभट्ट टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)
Manusmriti with Kulluka Bhatta Tika & Hindi Translation
by महर्षि मनु
Source: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (origin)
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Read in context२२ मनुस्मृति । वैश्यशूद्रोपचारं च सङ्कीर्णानां च सम्भवम् । आपद्धर्मं च वर्णानां प्रायश्चित्तविधिं तथा ॥ ११६ ॥ संसारगमनं चैव त्रिविधं कर्मसम्भवम् । निःश्रेयसं कर्मणां च गुणदोषपरीक्षणम् ॥ ११७ ॥ देशधर्मान् जातिधर्मान् कुलधर्मांश्च शाश्वतान् । पाखण्डगणधर्मांश्च शास्त्रेऽस्मिन्नुक्तवान् मनुः॥ ११८ ॥ वैश्य और शूद्रों के धर्मानुष्ठान का प्रकार, वर्णसङ्करों की उत्पत्ति, वर्णों का आपद्धर्म और प्रायश्चित्तविधि, उत्तम, मध्यम, अधम इन तीन प्रकार के कर्मों से देहगति का निर्णय, मोक्ष का स्वरूप, और कर्मों के गुण दोष की परीक्षा, देश धर्म, जाति का धर्म, कुल का धर्म जो परंपरा से चला आता है । पाखण्डियों के कर्म, गण-वैश्य आदि के धर्म इस शास्त्र में भगवान् मनु ने कहा है ॥ ११६-११८ ॥ यथेदमुक्तवान् शास्त्रं पुरा पृष्टो मनुर्मया । तथेद्ं यूयमप्यद्य मत्सकाशान्निबोधत ॥ ११९ ॥ इति मानवे धर्मशास्त्रे भृगुप्रोक्तायां संहितायां प्रथमोऽध्यायः ॥ जिस प्रकार, मनु से पूर्वकाल में मैंने पूछा, तब यह शास्त्र उन्हों ने उपदेश किया । उसी प्रकार अब आप मेरे से सुनिये ॥ ११९ ॥ पहला अध्याय समाप्त ॥