मनुस्मृति (कुल्लूकभट्ट टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)

मनुस्मृति (कुल्लूकभट्ट टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)
Manusmriti with Kulluka Bhatta Tika & Hindi Translation
by महर्षि मनु
Source: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (origin)
DevanagariSanskritpublished649 pages
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दूसरा अध्याय । २५ श्रुति वेद को और स्मृति धर्मशास्त्र को कहते हैं। ये दोनों. सब विषयों में निर्विवाद, तर्क-कुतर्क रहित हैं। क्योंकि, इन्हीं से धर्म का प्रकाश हुआ है। जो द्विज, कुतर्कों से इनकी निन्दा करते हैं, वे नास्तिक हैं, वेदनिन्दक हैं। वे शिष्टसमाज से निकाल देने योग्य हैं। वेद, स्मृति, सदाचार, और अपना सन्तोष, ये चार प्रकार के धर्मलक्षण, मुनियों ने कहे हैं ॥ १०–१२ ॥ अर्थकामेष्वसक्तानां धर्मज्ञानं विधीयते । धर्मं जिज्ञासमानानां प्रमाणं परमं श्रुतिः ॥ १३ ॥ श्रुतिद्वैधं तु यत्र स्यात्तत्र धर्मावुभौ स्मृतौ । उभावपि हि तौ धर्मौ सम्यगुक्तौ मनीषिभिः ॥ १४ ॥ उदितेऽनुदिते चैव समयाध्युषिते तथा । सर्वथा वर्तते यज्ञ इतीयं वैदिकीश्रुतिः ॥ १५ ॥ निषेकादिश्मशानान्तो मन्त्रैर्यस्योदितो विधिः । तस्यशास्त्रेऽधिकारोऽस्मिन ज्ञेयोनान्यस्यकस्यचित् ॥१६॥ जो पुरुष, अर्थ-प्रयोजन, काम-अभिलाष में नहीं फँसे हैं उनको धर्म ज्ञान होता है। धर्म जाननेवालों के लिए, सब से श्रेष्ठ प्रमाण श्रुति है। जहां श्रुति दो प्रकार की हो अर्थात् एक ही विषय को दो तरह से कहें, वहां दोनों वचन धर्म में प्रमाण हैं * यह ऋषियों ने कहा है । श्रुतिभेद की मान्यता दिखलाते हैं-उदितकाल-सूर्यो- दयकाल में, अनुदित-सूर्योदय से पूर्व में, समयाध्युषित-सूर्य, नक्षत्र- वर्जितकाल में, सर्वथा यज्ञ-होम होता है, यह वैदिकी श्रुति है † । यों ज्ञात होता है एकही श्रुति कालभेद कहती है और उन में
- जावालिवचन है-‘श्रुतिस्मृतिविरोघे तु श्रुतिरेव गरीयसी । अविरोधे सदा कार्य स्मार्त वैदिकवत्सदा ॥’ जैमिनि ने मीमांसा में ‘औदुम्बरीं स्पृष्ट्वोद्गायेत्’ ‘औदुम्बरी सर्वावेष्टयितव्या’ इन दो श्रुति-स्मृति वाक्यों के विरोध में ज्योतिष्टोम के प्रसङ्ग में श्रुति प्रामाण्यही माना है । † उदिते जुहोति । अनुदिते जुहोति । समयाध्युषिते जुहोति । ४