मनुस्मृति (कुल्लूकभट्ट टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)
Manusmriti with Kulluka Bhatta Tika & Hindi Translation
by महर्षि मनु
Source: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (origin)
Page 167 of 649
Read in contextदूसरा अध्याय । २७ कुरुक्षेत्र और मत्स्यदेश पञ्चाल और शूरसेनक * ये ब्रह्मर्षि देश, ब्रह्मावर्त के समीप हैं । कुरुक्षेत्रादि देशों में उत्पन्न ब्राह्मणों से सब मनुष्य अपने अपने उचित सदाचारों की शिक्षा ग्रहण करनी चाहिये हिमवान् पर्वत और विन्ध्याचल के बीच में, सरस्वती के पूर्व और प्रयाग के पश्चिम में, जो देश हैं, उनको 'मध्यदेश' कहते हैं । पूर्वसमुद्रसे पश्चिमसमुद्र तक, और हिमाचलसे विन्ध्या- चल के बीच में जो देश हैं, उनको 'आर्यावर्त' कहते हैं † ॥१६-२२॥ कृष्णसारस्तु चरति मृगो यत्र स्वभावतः । स ज्ञेयो यज्ञियो देशो म्लेच्छदेशस्त्वतःपरः ॥ २३ ॥ एतान् द्विजातयो देशान् संश्रयेरन् प्रयत्नतः । शूद्रस्तु यस्मिन् कस्मिन् वा निवसेद्वृत्तिकर्शितः॥२४॥ जिस देश में कृष्णसार मृग स्वभाव से विचरता है, वह यज्ञ क- रने योग्य देश है। इसके सिवा जो देश हैं, वे म्लेच्छ देश हैं-अ- र्थात् यज्ञ लायक नहीं हैं। इन देशों में, द्विजातियों को यत्नपूर्वक निवास करना चाहिये । और शूद्र, अपनी जीविकावश, चाहे जिस देश में निवास कर सकता है ॥ २३-२४ ॥ एषा धर्मस्य वो योनिः समासेन प्रकीर्तिता । संभवश्चास्य सर्वस्य वर्णधर्मांन्निबोधत ॥ २५ ॥ वैदिकैः कर्मभिः पुण्यैर्निषेकादिर्द्विजन्मनाम् । कार्यः शरीरसंस्कारः पावनः प्रेत्य चेह च ॥ २६ ॥
- मत्स्यदेश, राजां विराटकी राजधानी थी। जहां पाण्डवों ने एक वर्ष अज्ञात- वास किया था। पञ्चाल, दो भागों में बटा है, दक्षिण पञ्चाल और उत्तर पञ्चाल । यह आज कल का रोहिल खण्ड है । इसी के भीतर, कान्यकुब्ज देश भी है । इस देश का राजा द्रुपद था । शूरसेन देश, श्रीकृष्ण की जन्मभूमि है । इसके साथ, आज कल मथुरा, वृन्दावन, आगरा मिले हैं। † आर्यों के वर्त्तन-गमागंम से अर्थात् आने जाने से, आर्यावर्त नाम पड़ा है। शेष बातें इतिहास में, प्रसिद्ध हैं ।