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मनुस्मृति (कुल्लूकभट्ट टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)

मनुस्मृति (कुल्लूकभट्ट टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)

Manusmriti with Kulluka Bhatta Tika & Hindi Translation

by महर्षि मनु

Source: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (origin)

DevanagariSanskritpublished649 pages

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दूसरा अध्याय। ४५ पुरुष आशीर्वाद देने का क़ायदा न जानते हों, उनको प्रणाम समय में 'मैं हूं' इतना ही कहे और स्त्रियों को भी प्रणाम करते हुए यही कहना चाहिए। अभिवादन-प्रणाम करने के समय, अपने नाम के अन्त में 'भोः' कहे जैसा- 'देवदत्तशर्माहमस्मि भोः'। प्रणम्य पुरुष के नाम के स्थान में 'भोः' यह सम्बोधन ऋषियों ने कहा है। अर्थात् प्रणम्य का नाम न कहकर 'भोः' कहना चाहिए। विप्र प्रणाम करे तो आशीर्वाद में 'आयुष्मान् भव सौम्य' ऐसा कहे। और उसके नाम के अन्त में अकार को अगर व्यञ्जनान्त नाम हो तो उसके पहले अक्षर का प्लुत-ऊंचा उच्चारण करे *॥ १२१-१२५ ॥ यो न वेत्त्यभिवादस्य विप्रः प्रत्यभिवादनम् । नाभिवाद्यः स विदुषा यथा शूद्रस्तथैव सः ॥ १२६ ॥ ब्राह्मणं कुशलं पृच्छेत्क्षत्रबन्धुमनामयम् । वैश्यं क्षेमं समागम्य शूद्रमारोग्यमेव च ॥ १२७ ॥ जो ब्राह्मण, प्रणाम-आशीर्वाद की रीति न जानता हो उसको प्रणाम न करना चाहिए। क्योंकि वह शूद्र के समान है। आपस में मिलने पर ब्राह्मण से 'कुशल' क्षत्रिय से 'अनामय' वैश्य से 'क्षेम' और शूद्र से 'आरोग्य' पूछना चाहिए ॥ १२६-१२७ ॥ अवाच्यो दीक्षितो नाम्ना यवीयानपि यो भवेत् । भो भवत्पूर्वकं त्वेनमभिभाषेत धर्मवित् ॥ १२८ ॥ परपत्नी तु या स्त्री स्यादासंबंधा च योनितः । तां ब्रूयाद्भवतीत्येव सुभगे भगिनीति च ॥ १२६ ॥ मातुलांश्च पितृव्यांश्च श्वशुरानृत्विजो गुरून् । असावहमिति ब्रूयात् प्रत्युत्थाय यवीयसः ॥ १३० ॥

  • यह सब प्रणाम, आशीर्वाद की रीति संस्कृतभाषा में करने की लिखी गई है। प्रायः वेदपाठी-ब्रह्मचारी गुरुकुल में इन नियमों का पालन करतेगे ।