मनुस्मृति (कुल्लूकभट्ट टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)
Manusmriti with Kulluka Bhatta Tika & Hindi Translation
by महर्षि मनु
Source: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (origin)
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Read in context५० मनुस्मृति । विप्राणां ज्ञानतो ज्यैष्ठ्यं क्षत्रियाणां तु वीर्यतः । वैश्यानां धान्यधनतः शूद्राणामेव जन्मतः ॥१५५॥ न तेन वृद्धो भवति येनास्य पलितं शिरः । यो वै युवाप्यधीयानस्तं देवाः स्थविरं विदुः ॥ १५६ ॥ अज्ञानी ही बालक है और मन्त्रदाता ही पिता है। इसलिए अज्ञमूर्ख को बालक और मन्त्रदाता को पिता कहते हैं। न बहुत उमर से, न सफेद बालों से, न धन से, न सम्बन्ध-रिश्तेदारी में बड़ाई होने से ब्राह्मण की बड़ाई है, किन्तु जो वेद-विशारद है वही श्रेष्ठ है, यह ऋषियों ने नियम किया है। ब्राह्मणों का ज्ञान से, क्षत्रियों का पराक्रम से, वैश्यों का धन-धान्य से और शूद्रों का जन्म-उमर से बड़ाई होती है। शिर के बाल पक जाने से कोई वृद्ध नहीं होता, किन्तु जो युवा पुरुष भी वेद-विशारद है उसको भी देवताओं ने वृद्ध कहा है ॥ १५३-१५६ ॥ यथा काष्ठमयो हस्ती यथा चर्ममयो मृगः । यश्च विप्रोऽनधीयानस्त्रयस्ते नाम बिभ्रति ॥ १५७॥ यथा षण्ढोऽफलः स्त्रीषु यथा गौर्गवि चाफला । यथा चाज्ञेऽफलं दानं तथा विप्रोऽनृचोऽफलः ॥ १५८॥ अहिंसयैव भूतानां कार्यं श्रेयोऽनुशासनम् । वाक् चैव मधुराश्लक्ष्णा प्रयोज्या धर्ममिच्छता ॥ १५९॥ यस्य वाङ्मनसी शुद्धे सम्यग्गुप्ते च सर्वदा । स वै सर्वमवाप्नोति वेदान्तोपगतं फलम् ॥ १६० ॥ जैसा काठ का हाथी और चमड़ा का मृग, वैसा विना पढ़ा ब्राह्मण है। ये तीनों नाममात्र को रखते हैं पर किसी काम के नहीं हैं। जैसा स्त्रियों में नपुंसक पुरुष निष्फल, गौ के लिए दूसरी गौ निष्फल, अज्ञानी को दान निष्फल है, वैसा विना वेद पढ़ा