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मनुस्मृति (कुल्लूकभट्ट टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)

मनुस्मृति (कुल्लूकभट्ट टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)

Manusmriti with Kulluka Bhatta Tika & Hindi Translation

by महर्षि मनु

Source: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (origin)

DevanagariSanskritpublished649 pages

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६० मनुस्मृति । पूरे बीस साल का जवान और भला बुरा जाननेवाला शिष्य जवान गुरुस्त्री के पैर छूकर प्रणाम न करे, दूर से सदा करे। यह स्त्रियों का स्वभाव होता है कि पुरुषों को दोष लगा देना, इस लिए बुद्धिमान् स्त्रियों से सदा सावधान रहते हैं। संसार में पुरुष पण्डित हो या मूर्ख, उसको काम, क्रोध के वश कुमार्ग में लेजाने को स्त्रियां बड़ी समर्थ होती हैं। माता, बहन वा लड़की के साथ भी एकान्त में न बैठे, क्योंकि इन्द्रियां ऐसी प्रबल हैं कि विद्वान् के मनको भी खींच लेती हैं। यदि इच्छा हो तो युवा शिष्य युवती गुरुपत्नी को 'मैं अमुक हूं' कहकर दूर से प्रणाम करलेवे ॥ २१२–२१६ ॥ विप्रोष्य पादग्रहणमन्वहं चाभिवादनम् । गुरुदारेषु कुर्वीत सतां धर्ममनुस्मरन् ॥ २१७ ॥ यथा खनन्खनित्रेण नरो वार्यधिगच्छति । तथा गुरुगतां विद्यां शुश्रूषुरधिगच्छति ॥ २१८ ॥ मुण्डो वा जटिलो वा स्यादथवा स्याच्छिखाजटः । नैनं ग्रामेऽभिनिम्लोचेत् सूर्यो नाभ्युदयात्क्वचित् ॥ २१६ ॥ विदेश से आने पर पैर छूकर और रोज़ दूर से, गुरुस्त्री को प्रणाम करना चाहिए। यही शिष्यों का आचार है। जैसे पुरुष कुदाल-फावड़े से भूमि खोदता हुआ जल पाता है वैसे सेवा से गुरुविद्या को पाता है। ब्रह्मचारी, मुण्डित या शिखावाला, या जटाधारी हो उसको गाँव के भीतर सूर्योदय और सूर्यास्त न होना चाहिए। अर्थात् दोनों काल में गाँव के बाहर सन्ध्या-गायत्री की उपासना में रहना चाहिए ॥ २१७–२१६ ॥ तं चेदभ्युदियात्सूर्यः शयानं कामचारतः । निम्लोचेद्वाप्यविज्ञानाज्जपन्नुपवसेद्दिनम् ॥ २२० ॥ सूर्येण ह्यभिनिर्मुक्तः शयानोऽभ्युदितश्च यः। प्रायश्चित्तमकुर्वाणो युक्तः स्यान्महतेनसा ॥ २२१ ॥