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मनुस्मृति (कुल्लूकभट्ट टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)

मनुस्मृति (कुल्लूकभट्ट टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)

Manusmriti with Kulluka Bhatta Tika & Hindi Translation

by महर्षि मनु

Source: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (origin)

DevanagariSanskritpublished649 pages

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६८ मनुस्मृति । सवर्णाग्रे द्विजातीनां प्रशस्ता दारकर्मणि । कामतस्तु प्रवृत्तानामिमाः स्युः क्रमशॊ वराः ॥ १२ ॥ शूद्रैव भार्या शूद्रस्य सा च स्वा च विशः स्मृते । ते च स्वा चैव राज्ञश्च ताश्च स्वा चाग्रजन्मनः ॥ १३ ॥ न ब्राह्मणक्षत्रिययोरापद्यपि हि तिष्ठतोः । कस्मिंश्चिदपि वृत्तान्ते शूद्रा भार्योपदिश्यते ॥ १४ ॥ हीनजातिस्त्रियं मोहादुद्वहन्तो द्विजातयः । कुलान्येव नयन्त्याशु ससन्तानानि शूद्रताम् ॥ १५ ॥ ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य को अपने वर्ण की कन्या से विवाह श्रेष्ठ है। पर कामवश होकर जो विवाह होता है वह अधम विवाह है । शूद्र पुरुष शूद्र कन्या के साथ, वैश्य-वैश्य और शूद्र कन्या के साथ, क्षत्रिय-क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र कन्या के साथ, ब्राह्मण- ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र कन्या के साथ विवाह कर सकता है-यह अधम विवाह है । ब्राह्मण और क्षत्रिय को, आपत्तिकाल में भी शूद्र कन्या से विवाह न करना चाहिये । जो द्विजाति मोह- वश हीनजाति की कन्या से विवाह करता है वह अपने कुल और परिवार कोही शूद्र करदेता है ॥ १२-१५ ॥ शूद्रावेदी पतत्यत्रेरुतथ्यतनयस्य च । शौनकस्य सुतोत्पत्त्या तदपत्यतया भृगोः ॥ १६ ॥ शूद्रां शयनमारोप्य ब्राह्मणो यात्यधोगतिम् । जनयित्वा सुतं तस्यां ब्राह्मण्यादेव हीयते ॥ १७ ॥ दैवपित्र्यातिथेयानि तत्प्रधानानि यस्य तु । नाश्नन्ति पितृदेवास्तन्न च स्वर्गं स गच्छति ॥ १८ ॥ शूद्र कन्या के साथ विवाह करनेवाला ब्राह्मण पतित होजाता है । यह अत्रि और उतथ्य के पुत्र गौतमऋषि का मत है । शौनक