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मनुस्मृति (कुल्लूकभट्ट टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)

मनुस्मृति (कुल्लूकभट्ट टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)

Manusmriti with Kulluka Bhatta Tika & Hindi Translation

by महर्षि मनु

Source: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (origin)

DevanagariSanskritpublished649 pages

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९. मनुस्मृति। पुमान्पुंसोऽधिके शुक्रे स्त्री भवत्यधिके स्त्रियाः । समे पुमान्पुंस्त्रियौ वा क्षीणेऽल्पे च विपर्ययः ॥ ४६ ॥ निन्द्यास्वष्टासु चान्यासु स्त्रियो रात्रिषु वर्जयन् । ब्रह्मचार्येव भवति यत्र तत्राश्रमे वसन् ॥ ५० ॥ पुरुष का वीर्य अधिक होने पर पुत्र और स्त्री के अधिक में कन्या होती है। और दोनों के समान होने पर नपुंसक सन्तान या जोड़ा पैदा होता है। वीर्य क्षीण होने से सन्तान नहीं होती। पहले की दूषित आठ रात्रियों को छोड़कर, बाकी रात्रि में, जिस आश्रम का पुरुष स्त्रीभोग करता है, वह ब्रह्मचारी के समान माना जाता है ॥ ४६-५० ॥ न कन्यायाः पिता विद्वान् गृह्णीयाच्छुल्कमण्वपि । गृह्णञ्शुल्कं हि लोभेन स्यान्नरोऽपत्यविक्रयी ॥ ५१ ॥ स्त्रीधनानि तु ये मोहादुपजीवन्ति बान्धवाः । नारीयानानि वस्त्रं वा ते पापा यान्त्यधोगतिम् ॥५२॥ आर्षे गोमिथुनं शुल्कं केचिदाहुर्मृषैव तत् । अल्पोऽप्येवं महान् वापि विक्रयस्तावदेव सः ॥५३॥ यासां नाददते शुल्कं ज्ञातयो न स विक्रयः । अर्हणं तत्कुमारीणामानृशंस्यं च केवलम् ॥ ५४ ॥ विद्वान् पिता, कन्यादान में, कुछ भी उसके बदले में मूल्य न लेवे, यदि लोभ से कुछ ले लेता है तो वह सन्तान बेंचनेवाला है। कन्या का धन वाहन, वस्त्र आदि जो पिता, भाई आदि अपने भोग में लाते हैं वे नरक में पड़ते हैं । आर्ष-विवाह में जो एक एक वा दो दो गौ बैल वर से लिया जाता है-कोई आचार्य कहते हैं-वह मूल्य है, पर यह मिथ्या है। क्योंकि विक्रय का मूल्य कभी अधिक कभी कम होता है पर वह नियत है, इसलिये मूल्य नहीं है । जिस