मनुस्मृति (कुल्लूकभट्ट टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)
Manusmriti with Kulluka Bhatta Tika & Hindi Translation
by महर्षि मनु
Source: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (origin)
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Read in context७८ मनुस्मृति । अहुतं च हुतं चैव तथा प्रहुतमेव च । ब्राह्मं हुतं प्राशितं च पञ्चयज्ञान् प्रचक्षते ॥ ७३ ॥ जपोऽहुतो हुतो होमः प्रहुतो भौतिको बलिः । ब्राह्मं हुतं द्विजाग्र्यार्चा प्राशितं पितृतर्पणम् ॥ ७४ ॥ स्वाध्याये नित्ययुक्तः स्याद्दैवे चैवेह कर्मणि । दैवकर्माणि युक्तो हि बिभर्तीदं चराचरम् ॥ ७५ ॥ जो पुरुष, देवता, अतिथि, सेवक, माता-पिता आदि, और आत्मा इन पाँचों को अन्न नहीं देता वह जीता भी मरा सा है। कोई ऋषि पाँच महायज्ञों को अहुत, हुत, प्रहुत, ब्राह्महुत और प्राशित नाम से भी कहते हैं। अहुत-जप, हुत-होम, प्रहुत-भूत बलि, ब्राह्महुत-ब्राह्मणकी पूजा, प्राशित-नित्य श्राद्ध को कहते हैं। द्विज, वेदाध्ययन और अग्निहोत्र में सदा लगा रहे। जो देवकर्म में लगा रहता है, वह इस जगत का पोषण करता है ॥ ७२--७५ ॥ अग्नौ प्रास्ताहुतिः सम्यगादित्यमुपतिष्ठते । आदित्याज्जायते वृष्टिर्वृष्टेरन्नं ततः प्रजाः ॥ ७६ ॥ यथा वायुं समाश्रित्य वर्तन्ते सर्वजन्तवः । तथा गृहस्थमाश्रित्य वर्तन्ते सर्व आश्रमाः ॥ ७७ ॥ यस्मात्त्रयोऽप्याश्रमिणो ज्ञानेनान्नेन चान्वहम् । गृहस्थेनैव धार्यन्ते तस्माज्ज्येष्ठाश्रमो गृही ॥ ७८ ॥ क्योंकि—अग्नि में आहुति देने से सूर्य को मिलती है, सूर्य से वर्षा होती है, वर्षा से अन्न और अन्न से प्रजा का पालन होता है। जैसे सब प्राणी प्राणवायु के सहारे जीते हैं वैसेही सब आश्रम गृहस्थ के सहारे रहते हैं। तीनों आश्रमों को विद्या और अन्न दान से गृहस्थही धारण करता है इसलिए सब आश्रमवालों से गृहस्थाश्रमवाला बड़ा है ॥ ७६-७८ ॥