मनुस्मृति (कुल्लूकभट्ट टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)
Manusmriti with Kulluka Bhatta Tika & Hindi Translation
by महर्षि मनु
Source: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (origin)
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Read in context८२ मनुस्मृति । मिलता है, वही संन्यासी और ब्रह्मचारी को भिक्षा देने से मिलता है। वेदविशारद ब्राह्मण का आदर करके भिक्षा वा एक जलपात्र देवे। वेदपाठरहित, मूर्ख ब्राह्मण को अज्ञान से जो भोजन दान दियाजाता है वह सब निष्फल होजाता है । विद्या और तपसे युक्त ब्राह्मणों के मुख रूप अग्नि में जो हवन-भोजन कराता है, वह महा- दुःख और पापों से उबारता है ॥ ६३-६८ ॥ संप्राप्ताय त्वतिथये प्रदद्यादासनोदके । अन्नं चैव यथाशक्ति सत्कृत्य विधिपूर्वकम् ॥ ६६ ॥ अतिथि-सत्कार । गृहस्थ को आये हुए अतिथि का आसन, जल और अन्नसे यथा- शक्ति सत्कार करना चाहिए ॥ ६६ ॥ शिलानप्युञ्छतो नित्यं पञ्चाग्नीनपि जुह्वतः । सर्वं सुकृतमादत्ते ब्राह्मणोऽनर्चितो वसन् ॥ १०० ॥ तृणानि भूमिरुदकं वाक् चतुर्थी च सूनृता । एतान्यपि सतां गेहे नोच्छिद्यन्ते कदाचन ॥ १०१ ॥ एकरात्रं तु निवसंन्नतिथिर्ब्राह्मणः स्मृतः । अनित्यं हि स्थितो यस्मात्तस्मादतिथिरुच्यते ॥ १०२ ॥ नैकग्रामीणमतिथिं विप्रं साङ्गतिकं तथा । उपस्थितं गृहे विद्याद्भार्या यत्राग्नयोऽपि वा ॥ १०३ ॥ जो उञ्छवृत्ति 'खेतों से अन्न बीनकर निर्वाह' करता हो और पञ्चाग्नि में हवन करता हो वह भी यदि अतिथि का सत्कार न करे तो अतिथि उसके सब पुण्य को ले लेता है । अन्न न हो तोभी तृणासन, भूमि, जल और मीठी बात ये सत्पुरुषों के यहां सदा रहते हैं। जो ब्राह्मण एक रात्रि गृहस्थ के यहां निवास करता है उसको अतिथि कहते हैं । वह नित्य नहीं रहता इसी लिए अतिथि कहाजाता है। एक गांव में रहनेवाला, हँसी, मज़ाक करके साथ